भगवद गीता Quotes in Hindi: 20 अनमोल श्लोक अर्थ सहित
भगवद गीता के 20 सबसे अनमोल श्लोक, हर एक का सरल हिंदी अर्थ. कर्म, आत्मा, भक्ति और शरणागति पर श्रीकृष्ण के वचन एक जगह.

भगवद गीता के ये अनमोल विचार (quotes) सिर्फ़ पढ़ने की चीज़ नहीं, जीने का रास्ता हैं। नीचे गीता के 20 सबसे प्रसिद्ध श्लोक हैं, हर एक का सरल हिंदी अर्थ के साथ. कर्म, आत्मा, भक्ति और शरणागति, चार विषयों में बँटे, ताकि जो बात आज आपके मन को चाहिए वही तुरंत मिल जाए। हर श्लोक के नीचे उसका पूरा अर्थ पढ़ने का लिंक भी है।
कर्म पर गीता के श्लोक (Bhagavad Gita quotes about karma)
गीता का सबसे बड़ा उपदेश यही है, कर्म करो, फल की चिंता छोड़ो।
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥
कर्म करना आपके अधिकार में है, उसका फल नहीं। फल कई कारणों पर निर्भर है, केवल आपके प्रयास पर नहीं। इसलिए पूरे मन से कर्म करें, अपेक्षा नहीं, आलस्य भी नहीं। → कर्मण्येवाधिकारस्ते का पूरा अर्थ
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥
सफलता मिले या न मिले, मन एकसमान रखिए। फल की आसक्ति छोड़कर, योगस्थ होकर कर्म कीजिए। यही समत्व है, यही योग है। → समत्वम् योग उच्यते का अर्थ
बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्॥
समभाव से कर्म करने वाला पुण्य और पाप, दोनों के बंधन से मुक्त हो जाता है। इसीलिए योग में लगो। योग ही कर्म में असली कुशलता है। → योगः कर्मसु कौशलम् का अर्थ
ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।
सङ्गात् संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥
विषयों के बारे में बार-बार सोचना आसक्ति जन्माता है, आसक्ति से इच्छा, इच्छा से क्रोध। जहाँ ध्यान जाता है, मन वहीं खिंचता है। → आसक्ति से क्रोध तक का अर्थ
आत्मा और जीवन-मृत्यु पर श्रीकृष्ण के वचन
गीता का दूसरा स्तंभ, तुम शरीर नहीं, अजर-अमर आत्मा हो।
न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥
आत्मा न जन्मती है, न मरती है। शरीर नाशवान है, आत्मा नित्य और शाश्वत। शरीर कट जाए तो भी आत्मा को कोई आँच नहीं आती। → न हन्यते हन्यमाने शरीरे का अर्थ
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही॥
आत्मा शरीर बदलती है जैसे मनुष्य पुराने वस्त्र उतारकर नए पहनता है। मृत्यु शरीर का अंत है, आत्मा का नहीं। → वासांसि जीर्णानि का अर्थ
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः॥
आत्मा को न शस्त्र काट सकते हैं, न अग्नि जला सकती है, न जल भिगो सकता है, न वायु सुखा सकती है। आत्मा अविनाशी है। → नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि का अर्थ
देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा।
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति॥
जैसे एक ही जीव बचपन, यौवन और बुढ़ापे से गुज़रता है, वैसे ही मृत्यु के बाद वह नए शरीर में प्रवेश करता है। ज्ञानी इससे घबराता नहीं। → देहिनोऽस्मिन्यथा देहे का अर्थ
विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः।
निर्ममो निरहंकारः स शांतिमधिगच्छति॥
जो सभी इच्छाएँ छोड़ देता है, जो 'मेरा' और 'मैं' के भाव से मुक्त होकर जीता है, वही सच्ची शांति पाता है। → विहाय कामान्यः का अर्थ
भक्ति और शरणागति पर गीता के अनमोल विचार
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥
अनन्य भाव से केवल कृष्ण का ध्यान करने वाले भक्त के लिए जो नहीं मिला उसे दिलाना और जो मिला उसकी रक्षा करना, दोनों कृष्ण की ज़िम्मेदारी है। → अनन्य भक्ति का अर्थ
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः॥
भगवान पत्ता, फूल, फल या जल भी स्वीकार करते हैं, बशर्ते भक्ति सच्ची हो। बड़ी भेंट नहीं, अर्पण करने वाले के मन की पवित्रता मायने रखती है। → पत्रं पुष्पं फलं तोयं का अर्थ
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः॥
मन को कृष्ण पर टिकाना, भक्ति करना, पूजा करना और नमन करना, यही पूर्ण समर्पण है। यह अभ्यास चित्त को परमात्मा से जोड़ देता है। → मन्मना भव मद्भक्तो का अर्थ
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥
सभी धर्मों और आसरों को छोड़कर केवल कृष्ण की शरण लो। वे स्वयं समस्त पापों से मुक्त करने का वचन देते हैं। कोई भय नहीं, कोई चिंता नहीं। → सर्वधर्मान परित्यज्य का अर्थ
धर्म और अवतार पर श्रीकृष्ण के वचन
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदाऽऽत्मानं सृजाम्यहम्॥
जब-जब धर्म का पतन और अधर्म का उत्थान होता है, तब-तब ईश्वर स्वयं देह धारण करते हैं। यह संयोग नहीं, सृष्टि की शाश्वत व्यवस्था है। → यदा यदा हि धर्मस्य का अर्थ
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे॥
भगवान हर युग में साधुओं की रक्षा और धर्म की स्थापना के लिए प्रकट होते हैं। → परित्राणाय साधूनां का अर्थ
शोक, मोह और तितिक्षा पर गीता का उपदेश
अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे।
गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः॥
पंडित न जीवितों पर शोक करते हैं, न मृतों पर। आत्मज्ञान के सामने विलाप अज्ञान का प्रमाण बन जाता है। → अशोच्यान् अन्वशोचस्त्वं का अर्थ
मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः।
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत॥
सुख-दुःख इंद्रियों के संपर्क से उत्पन्न होते हैं, दोनों अनित्य हैं, आते-जाते रहते हैं। इन्हें तितिक्षा से सहें, मन विचलित न हो। → तितिक्षा का अर्थ
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय॥
गीता का पहला श्लोक, 'मामकाः' (मेरे) और 'पाण्डव' के बीच का यही फर्क धृतराष्ट्र की आत्मिक अंधता है और पूरी गीता की शुरुआत। → धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे का अर्थ
कृपया परयाऽऽविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत्।
दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्॥
अर्जुन ने अपने स्वजनों को देखकर करुणा नहीं, मोह महसूस किया, और यही मोह उनके साहस को तोड़ रहा था। → अर्जुन विषाद का अर्थ
इन श्लोकों को जपें, सिर्फ़ पढ़ें नहीं
गीता के ये वचन तब बदलते हैं जब इन्हें दोहराया जाए, मन में बसाया जाए। किसी एक श्लोक या भगवान के नाम को रोज़ जपिए और गिनती रखिए, हमारे फ्री नाम जप काउंटर पर, 108 की माला के साथ। चाहें तो राधा नाम जप की विधि से शुरू कीजिए।

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