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समत्वम् योग उच्यते — योगस्थः का असली मतलब

क्या 'योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं' (गीता 2.48) सिर्फ काम से पहले ध्यान करने की बात है?

इस श्लोक का असली अर्थ: समत्व — सफलता और विफलता में एकसमान रहना — यही श्रीकृष्ण ने योग कहा है।

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भगवद्गीता 2.48 — समत्वम् योग उच्यते अर्थ

अध्याय 2 — सांख्ययोग · श्लोक 48

क्या गीता 2.48 कह रही है कि सफलता-असफलता में उदासीन रहो? अधिकांश लोग यही समझते हैं — कि 'उदासीनता' ही 'समत्व' है। पर दोनों अलग हैं, और इसी फर्क में इस श्लोक की गहराई है।

श्लोक (गीता 2.48 — योगस्थः कुरु कर्माणि)

योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।

सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते

yoga-sthaḥ kuru karmāṇi saṅgaṁ tyaktvā dhanañjaya

siddhy-asiddhyoḥ samo bhūtvā samatvaṁ yoga uchyate

समत्वम् योग उच्यते अर्थ का अर्थ क्या है? (सरल में)

समत्वं योग उच्यते। कृष्ण यहाँ कह रहे हैं कि योग कोई आसन या ध्यान-विधि नहीं है। सफलता और असफलता में मन को एकसमान रखना, फल की आसक्ति छोड़कर कार्यरत रहना यही योग है। आमतौर पर लोग 'परिणाम की चिंता न करो' को उदासीनता समझते हैं। पर समत्व का अर्थ है भीतरी स्थिरता, उदासीनता नहीं।

B.R. Chopra की महाभारत में जब अर्जुन का रथ दोनों सेनाओं के बीच खड़ा होता था, बचपन में वह दृश्य आँखों में अटक जाता था। कृष्ण के शब्द 'योगस्थः कुरु कर्माणि' कब कंठस्थ हो गए, याद नहीं। पर तब 'योग' का अर्थ 'जोड़' लगता था, शायद 'व्यायाम'। कि समत्व ही योग है — यह बात बहुत बाद में खुली, जब जीवन में पहली बड़ी असफलता सामने आई।

पदच्छेद

शब्दअर्थ
योगस्थःयोग में स्थित
कुरुकरो
कर्माणिकर्म
सङ्गंआसक्ति
त्यक्त्वात्यागकर
धनञ्जयहे धनञ्जय
सिद्ध्यसिद्ध्योःसफलता-असफलता में
समोसमभाव से
भूत्वाहोकर
समत्वंसमता
योगयोग
उच्यतेकहलाता है

समत्वम् योग उच्यते अर्थ की गहरी व्याख्या

योगस्थः और समत्वम्: शब्दों में छिपा समीकरण

श्रीकृष्ण यहाँ एक सरल-सी घोषणा करते हैं। "समत्वम् योग उच्यते।" अर्थात् समत्व ही योग कहलाता है। यह कोई उपमा नहीं, न कोई अलंकार। यह एक सीधी बराबरी है। एक शब्द दूसरे का पर्याय बन जाता है।

"योगस्थः" का वज़न भी इसी समीकरण से आता है। पहले आप योग में स्थित हों, फिर कर्म करें। क्रम उल्टा नहीं चलेगा। कर्म करते-करते योग नहीं आता। योग में बैठकर कर्म शुरू होता है।

"सङ्गं त्यक्त्वा" में जो "त्यक्त्वा" है, वह एक पूर्ण-रूपेण बीत चुकी क्रिया है। अर्जुन को कर्म शुरू करने से पहले ही आसक्ति छोड़ देनी है। बीच में छोड़ना नहीं, पहले ही छोड़ आना है।

समत्व योग की परिभाषा नहीं, योग का पर्याय है।

समत्व ही योग है: परिभाषा नहीं, पहचान

कल्पना कीजिए एक संगीतकार की। वह सभा में राग गा रहा है। कोई श्रोता वाह कहे, कोई चुप बैठे रहे, कोई उठकर चला जाए। पर उसका सुर? वह अंतर नहीं जानता। उसकी तानें सधी रहती हैं, उसकी साँस समान चलती है।

यही समत्व है। बाहर की हवा कैसी भी बहे, भीतर का दीपक एक ही लौ से जलता है। यह किसी तकनीक से नहीं आता, न किसी अभ्यास के अंत में मिलता है। यह वह अवस्था है जिसमें आप स्थित होते हैं।

An earthen lamp burning steadily in darkness: wind gusts, rain patters the window, the flame insid...

श्रीकृष्ण योग को यहाँ कोई प्रक्रिया नहीं बता रहे। वे उसे एक मानसिक मुद्रा कह रहे हैं। आसन नहीं, आसीनता। साधना नहीं, सधा होना।

सिद्धि और असिद्धि: बीच में नहीं, दोनों में एक साथ

"सिद्ध्यसिद्ध्योः" एक विशेष व्याकरण-रूप है। यह द्वि-वचन में और अधिकरण-कारक में है। इसका अर्थ है: सिद्धि और असिद्धि, दोनों के भीतर। बीच में नहीं। ऊपर नहीं। दोनों के भीतर, एक साथ।

फिर आता है "भूत्वा। " हो जाने के बाद। यह एक पूरी पहचान-परिवर्तन की माँग है। आपको समान होना है, समान होने का प्रयत्न नहीं करना है। प्रयत्न बाहर का विषय है, होना भीतर का।

कुम्हार का चाक देखिए। कभी तेज़ घूमता है, कभी धीमा पड़ जाता है। कभी मिट्टी जम जाती है, कभी बिखर जाती है। पर कुम्हार का हाथ? वह दोनों क्षणों में एक ही दृढ़ता से मिट्टी को थामे रहता है। सफलता के क्षण में भी उसी हाथ से, विफलता के क्षण में भी उसी हाथ से।

A potter at the spinning wheel: in one instant the clay centers perfectly, in the next it threaten...
समान होना है, समान होने का प्रयत्न नहीं करना।

सबसे बड़ी भ्रांति: योग करना बनाम योग होना

आज बहुत लोग योग को एक क्रिया मानते हैं। प्रातःकाल आसन, प्राणायाम, ध्यान। आधा घंटा, एक घंटा, फिर समाप्त। इसके बाद जीवन का अशांत कर्म-व्यवहार शुरू।

पर यह श्लोक उस समझ को उलट देता है। योग कोई "करने" की वस्तु नहीं है। योग एक "होने" की अवस्था है। जब आप समत्व में स्थित हैं, तभी आप योग में हैं। जब आप उससे बाहर गिरे, तब कोई भी शारीरिक मुद्रा आपको योगी नहीं बना सकती।

यह शब्द-खेल नहीं है। यह एक मौलिक दृष्टि-भेद है। योगी वह नहीं जो योग करता है। योगी वह है जो योग में है।

योग करने की वस्तु नहीं, होने की अवस्था है।

तीन धाराएँ: कर्मयोग, सांख्य, भक्ति

यही श्लोक तीन दार्शनिक धाराओं का संगम है। कर्मयोग कहता है: कर्म करो, पर आसक्ति छोड़ो। सांख्य कहता है: द्रष्टा और दृश्य का भेद समझो, फिर सुख-दुःख अपने नहीं लगते। भक्ति कहता है: फल प्रभु के चरणों में रखो, फिर हार-जीत आपकी रहती ही नहीं।

तीनों का निष्कर्ष एक है। चित्त समान हो। बाहर का हिसाब ऊपर छोड़ दिया जाए। भीतर की शांति ही असली योग है। और यही समता वह मंच है जिस पर अर्जुन को अपना कर्म खड़ा करना है।

आज के जीवन में

जिस दिन परिणाम उम्मीद से उलट निकले, उसी शाम पता चलता है कि यह श्लोक कहाँ तक उतरा।

योगस्थः: साधना करना और योग में होना

इस श्लोक पर एक सवाल बार-बार आता है: अगर योग चित्त की समता है, तो सुबह की साधना (आसन, प्राणायाम, ध्यान) किस काम की? यह भ्रम इसलिए है क्योंकि "योग" शब्द को एक क्रिया समझ लिया जाता है।

"योगस्थः" एक अवस्था-विशेषण है, क्रिया-संज्ञा नहीं। आप योग करते नहीं, योग में होते हैं। साधना उस अवस्था तक पहुँचने का मार्ग हो सकती है। पर साधना ही लक्ष्य नहीं।

फ़र्क़ यह है: तीन घंटे की बैठक में जो निर्णय आपके पक्ष में नहीं गया, उस शाम आप किस मनःस्थिति में लौटे? अगर चित्त वहाँ डगमगाया, तो सुबह का समय व्यायाम में बीता था, योग में नहीं। व्यायाम अच्छा है। वह योग नहीं है।

लोकमान्य तिलक की मंडाले कोठरी में समत्वम् योग का अर्थ

1908 में ब्रिटिश सरकार ने लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक को मंडाले जेल भेजा। छह साल। उस कोठरी में उन्होंने गीता रहस्य लिखा, कर्मयोग पर एक पूरा ग्रंथ।

A bearded scholar sits writing at a simple desk in a sparse stone cell: walls confining, outcome b...
कारावास में समत्व का कर्मयोग

तिलक का केंद्रीय प्रश्न था: अगर फल की चिंता छोड़नी है, तो स्वतंत्रता के लिए संघर्ष का अर्थ क्या? उनका उत्तर था कि फल से विरक्ति और कर्म की दृढ़ता साथ-साथ चलती हैं। जेल की दीवारें परिणाम हैं। लेखनी चलती रहना: योगस्थः कर्म है।

यह प्रश्न आज भी जीवित है। परिणाम अक्सर आपके हाथ में नहीं होते। समत्व और कर्म, दोनों आपके हाथ में होते हैं।

तीन बिंदुओं में दैनिक अभ्यास

सुबह का संकल्प: आज का कार्य क्या है? उसे तय करें, परिणाम की चर्चा बाद में।

दिन का कर्म: हर निर्णय के बाद एक सवाल: यह कर्म से आया, या बेचैनी से?

शाम की समीक्षा: आज जो भी उम्मीद से अलग हुआ, उस पर चित्त कैसा रहा?

तीसरा प्रश्न पूछने की हिम्मत हो तो समत्व पर काम हो रहा है।

आपके कर्म का सबसे सच्चा गवाह कौन है, परिणाम या वह चित्त जिससे कर्म निकला?


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संदर्भ

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

लेखक
Satish Sahu — jaapak.com लेखक
सतीश साहू

स्वतंत्र लेखक, jaapak.com

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इस लेख के बारे में

इस लेख की व्याख्या भगवद्गीता के मूल संस्कृत पाठ और विभिन्न भारतीय दर्शन-धाराओं की सामान्य समझ पर आधारित है। किसी आधुनिक अनुवाद या टीकाकार का शब्दशः उद्धरण नहीं है।

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