विहाय कामान्यः: निर्मम, निरहंकार की असली शांति
क्या 'विहाय कामान्यः' (गीता 2.71) सिर्फ बाहरी त्याग की बात करता है?
इस श्लोक का असली अर्थ: जो निर्मम और निरहंकार होकर जीता है, वही सच्ची शांति पाता है।

अध्याय 2 · सांख्ययोग · श्लोक 71
'सभी इच्छाएँ छोड़ना' सुनकर लगता है कि संसार छोड़कर वन में जाना पड़ेगा। श्लोक भीतर का रास्ता बता रहा है, बाहर का नहीं।
श्लोक (गीता 2.71, विहाय कामान्यः)
विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः।
निर्ममो निरहंकारः स शांतिमधिगच्छति
vihāya kāmān yaḥ sarvān pumānśh charati niḥspṛihaḥ
nirmamo nirahankāraḥ sa śhāntim adhigachchhati
विहाय कामान्यः अर्थ का अर्थ क्या है? (सरल में)
'निर्ममो निरहंकारः' का अर्थ है जिसके मन में 'यह मेरा है' और 'मैं हूँ' का भाव बिल्कुल न हो। लोग इसे भ्रमवश संन्यास और घर छोड़ने से जोड़ते हैं। किंतु श्लोक 2.71 कहता है कि यह एक आंतरिक दशा है, सभी इच्छाओं, ममत्व और अहंकार से मुक्त होकर जीना ही सच्ची शांति का द्वार है।
इस श्लोक में तीन शब्द एक साथ आते हैं: निःस्पृहः, निर्ममः, निरहंकारः। तीनों में 'नि' उपसर्ग है, यानी 'बिना'। बिना लालसा, बिना ममता, बिना अहंकार। पर क्या ये तीन अलग-अलग काम हैं, या एक ही जड़ से उगते हैं? और उस जड़ को काटने का रास्ता क्या है जब मन रोज़ नई इच्छाएँ जन्म देता रहता है?
पदच्छेद
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| विहाय | छोड़कर |
| कामान् | इच्छाओं को |
| यः | जो |
| सर्वान् | सभी |
| पुमान् | मनुष्य |
| चरति | विचरता है |
| निःस्पृहः | तृष्णारहित |
| निर्ममः | ममतारहित |
| निरहंकारः | अहंकाररहित |
| सः | वह |
| शांतिम् | शांति को |
| अधिगच्छति | पाता है |
विहाय कामान्यः अर्थ की गहरी व्याख्या
विहाय और निःस्पृहः: एक ही धागे के दो छोर
श्लोक की पहली पंक्ति में दो शब्द बगल-बगल रखे गए हैं। विहाय का अर्थ है छोड़ देना। और निःस्पृहः, यानी जिसमें अब छिपी हुई लालसा भी न बचे। ये दोनों एक नहीं हैं।
कोई व्यक्ति किसी चीज़ को बाहर से छोड़ सकता है, पर मन के कोने में उसकी हल्की-सी चाह बैठी रह सकती है। फिर वही चाह सपने में, बातचीत में, या क्रोध में अचानक बाहर आती है। श्लोक की कसौटी यही है: छोड़ने भर से बात नहीं बनती, चाह की जड़ ही उखाड़नी होगी।
यहीं एक और शब्द ध्यान खींचता है: चरति। पाठ रहता है नहीं लिखता, चलता है लिखता है। मूल धातु चर् का अर्थ ही गति है। यानी जो व्यक्ति इच्छाओं को छोड़ चुका है, वह कहीं बैठ नहीं जाता। वह संसार में चलता है, काम करता है, बातें करता है। बस, चीज़ों से चिपकता नहीं।
इच्छा छोड़ना अलग है, चाह न रखना बिल्कुल अलग।
चरति: संन्यास नहीं, सक्रिय यात्रा
बहुत-से पाठक मानते हैं कि शांति का रास्ता घर छोड़कर, कारोबार छोड़कर, परिवार से अलग होकर जंगल जाने में है। श्लोक इस समझ को सीधे अस्वीकार करता है।
डाकिए को देखिए। वह हर दिन दर्जनों घरों में चिट्ठियाँ बाँटता है। हर लिफ़ाफ़े पर किसी और का नाम होता है।
वह पढ़ता नहीं, संभालता है, पहुँचाता है, आगे बढ़ जाता है। दिन के अंत में उसका थैला ख़ाली होता है, और मन भी हल्का।
अब कल्पना कीजिए। यही डाकिया हर लिफ़ाफ़े पर ठिठक जाए, सोचने लगे 'यह मेरे लिए क्यों नहीं', 'मुझे ऐसी ख़बर क्यों नहीं मिलती'। तब उसका काम वहीं रुक जाएगा। थैला भारी, मन उससे भी भारी।
श्लोक का व्यक्ति इसी डाकिए जैसा है। वह संसार में चलता है, दायित्व निभाता है, पर हर अनुभव पर अपने नाम की चिप्पी नहीं लगाता। मुझे यह बात पहली बार पढ़ते समय रुककर सोचना पड़ा था, क्योंकि यह भागने की बात नहीं, चलते रहने की बात है।
शांति निष्क्रियता नहीं, मुक्त गति का दूसरा नाम है।
निर्मम और निरहंकार: दो अलग खंभे
दूसरी पंक्ति में दो विशेषण लगातार आते हैं। निर्ममः, जिसमें मेरा का भाव न हो। और निरहंकारः, जिसमें मैं का भाव न हो। पाठ इन्हें एक साथ नहीं मिलाता, अलग-अलग गिनता है। कारण है। दोनों झूठी पहचान के दो अलग खंभे हैं।
- निर्मम बाहर की पकड़ छोड़ता है। मकान, पैसा, रिश्ते, इन पर मेरा की चिप्पी लगाने से रोकता है।
- निरहंकार अंदर की पकड़ छोड़ता है। मैं विद्वान हूँ, मैं सफल हूँ, मैं दुखी हूँ, इन सब मुहरों को हटाता है।
एक व्यक्ति अपनी सारी संपत्ति दान कर सकता है, फिर भी मन में मैं ही सबसे बड़ा त्यागी हूँ की मुहर लगाए घूम सकता है। उसकी पकड़ छूटी नहीं, बस रूप बदल गया। श्लोक दोनों खंभों को एक साथ गिराने को कहता है।
रंगमंच पर अभिनेता राजा का पाठ निभाता है। मुकुट पहनता है, राजसी संवाद बोलता है। पर्दा गिरते ही मुकुट उतार देता है।
न मुकुट को मेरा समझता है, न राजा होने को मैं समझता है। यही इस श्लोक का संकेत है।
सबसे बड़ी भ्रांति: शांति यानी निष्क्रियता नहीं
लोग शांति शब्द सुनते ही कल्पना करते हैं: बैठ जाना, चुप हो जाना, हाथ खींच लेना। पाठ इस तस्वीर को ग़लत बताता है।
नदी पहाड़ से उतरती है, मैदान पार करती है, सागर में मिल जाती है। रास्ते में पत्थर हैं, मोड़ हैं, गहराइयाँ हैं।
पर नदी कहीं अटकती नहीं। हर पत्थर के पास रुककर यह मेरा है नहीं कहती। यही उसकी असली शांति है: रुकी हुई नहीं, बहती हुई।
ठहरा हुआ पानी सड़ता है। मुक्त धारा निर्मल रहती है। श्लोक की शांति इसी मुक्त धारा जैसी है, बहाव में सधी हुई।
अधिगच्छति: पहुँचना, मिल जाना नहीं
अंत में एक और शब्द ध्यान देने योग्य है। अधिगच्छति यानी पहुँचता है। पाठ मिलती है नहीं कहता: पहुँचता है कहता है। शांति किसी कोने में पड़ी कोई वस्तु नहीं है जो संयोगवश हाथ लग जाए। यह वह स्थान है जहाँ साधक अपने पैरों से चलकर पहुँचता है।
जैसे कोई मेहमान दूर के शहर में अपने सम्बंधी के घर जाता है। रास्ता ख़ुद तय करना होता है। पहुँचने पर मेज़बान का घर भरपूर मिलता है, पर वह घर अपना बनाकर नहीं रखता।
ठहरता है, सुख लेता है, समय पर लौट जाता है। शांति भी इसी ठहराव जैसी है, मिली हुई नहीं, चलकर पाई हुई।
जो कहीं रुकता नहीं, वही हर जगह पहुँचता है।
विहाय कामान्यः अर्थ आज के जीवन में
आज के जीवन में
यह श्लोक एक धारणा बदलता है: शांति किसी चीज़ को पाने से नहीं, किसी चीज़ से चिपकना बंद करने से मिलती है।
निर्ममो निरहंकारः: क्या शांति पाने के लिए सब कुछ छोड़ना ज़रूरी है?
इस श्लोक पर सबसे गहरा भ्रम यही है। लोग मानते हैं: शांति चाहिए, तो पहले घर छोड़ो, कारोबार छोड़ो, परिवार से अलग हो जाओ।
पर श्लोक का एक शब्द यह कल्पना तोड़ता है। चरति: यानी चलता है। यहाँ का आदर्श व्यक्ति बैठा नहीं है। वह संसार में सक्रिय है।
फ़र्क सिर्फ़ इतना है। वह हर अनुभव पर अपने नाम की मुहर नहीं लगाता।
श्लोक दो चीज़ें अलग गिनता है:
- निर्मम: मकान, धन, रिश्तों पर मेरा न कहना।
- निरहंकार: मैं त्यागी हूँ, मैं ज्ञानी हूँ: यह भी एक पकड़ है।
जो सब छोड़कर जंगल गया, पर मन में "मैं सबसे बड़ा त्यागी" की मुहर लगाए बैठा है, उसकी पकड़ तो और गहरी हो गई। मुझे पहली बार यह अंतर पढ़ते हुए रुकना पड़ा था।
विहाय कामान्: नवंबर 1675 में गुरु तेगबहादुर का जीया हुआ श्लोक
नवंबर 1675। दिल्ली के चाँदनी चौक।
नौवें सिख गुरु, श्री गुरु तेगबहादुर जी, अपनी मृत्यु की प्रतीक्षा में बैठे थे। एक विकल्प था: इस्लाम स्वीकार करना।
उन्होंने मना किया। किसके लिए?
कश्मीरी पंडितों के लिए। जिनका धर्म उनसे अलग था। जिनकी जाति भी अलग। उनके ईश्वर को बचाने के लिए।
यही निर्मम है: मेरे लोगों की दीवार मिट जाना। यही निरहंकार है: नाम, यश, स्मृति की चाह न रखना। और यही शांतिमधिगच्छति है। उन्होंने मृत्यु को भी बिना किसी दावे के स्वीकार किया।
विहाय कामान् को जीने वाले कम लोग होते हैं। लिखने वाले अनेक।
तीन-चरण दैनिक अभ्यास:
1. सुबह का प्रश्न: "आज मैं किस चीज़ से चिपका हूँ?" उसे नाम दो। वह पहचान ही उससे थोड़ी दूरी बनाती है।
2. दिन का कर्म: हर काम में बस वह काम। फ़ल, यश, परिणाम बाद में। बस यह पल पूरा करो।
3. शाम की समीक्षा: "आज एक पल ऐसा था जब मैंने कोई काम बिना दावे के किया?" वह पल शांति का बीज है।
क्या आज ऐसा एक क्षण था जब आपने कोई दायित्व बिना किसी मेरा के निभाया?
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संदर्भ
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

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