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माला जपने का सही तरीका: गिनती नहीं, रोज़ का नियम

माला जपने का सही तरीका क्या है? प्रेमानंद महाराज कहते हैं माला बड़ा सहारा है, पर गिनती नहीं, भाव और रोज़ का अभ्यास ही असली जप है। मन न लगे तो क्या करें, यहाँ पढ़िए।

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श्री प्रेमानंद जी महाराज, माला जपने का सही तरीका, भाव और रोज़ के अभ्यास का मार्ग

माला घूमती रही, और मन बाज़ार में था

सुबह की बात है। हाथ में माला थी, अँगूठे से मनके (beads) सरक रहे थे, और मन? मन तो दुकान का हिसाब जोड़ रहा था। पूरी माला घूम गई, पर एक बार भी नाम दिल तक नहीं पहुँचा।

मुझे लगता है यह हम सबके साथ होता है। इसीलिए लोग पूछते हैं कि माला जपने का सही तरीका क्या है। कौन सी उँगली, कितनी माला, किस दिशा में घुमाएँ। पर असली सवाल यह नहीं है। असली सवाल तो यह है कि जप किसका हो रहा है, माला का या नाम का।

श्री प्रेमानंद जी महाराज ठीक यहीं बात पकड़ते हैं। वे तरीका भी बताते हैं, पर तरीके को नियम-कानून का बंधन नहीं बनने देते। माला तो बस एक सहारा है, असली चीज़ नाम है। यही छोटी सी बात समझ आ जाए, तो पूरी साधना बदल जाती है।


माला ज़रूरी है, या नाम?

नाम ज़रूरी है, माला नहीं। माला तो उसका सहारा भर है, कोई ज़रूरी शर्त नहीं। जप माला सदियों से भक्तों के साथ रही है, क्योंकि वह नाम भूलने नहीं देती। पर उसका काम सेवक जैसा है, मालिक जैसा नहीं।

महाराज जी इसे बहुत सीधे शब्दों में कहते हैं:

"यहाँ तक पहुँचने के लिए बहुत बड़ा सपोर्ट है माला। इसे व्यर्थ न समझा जाए। अगर आपके हाथ में माला है, बात भी करना हुआ तो आपको लगेगा कि माला है, और बात करना बंद होगा।"

श्री प्रेमानंद जी महाराज

देखिए, माला का असली काम क्या है। वह सिर्फ़ गिनने की चीज़ नहीं है, वह तो नाम याद दिलाने वाली है। हाथ में माला हो और आप बातों में उलझने लगें, तो उँगली में आया अगला मनका (bead) टोक देता है कि अरे, नाम तो छूट गया। बस यही उसकी असली सेवा है।

तो जिसके पास माला न हो, वह क्या करे? वह भी जप करे। नाम को किसी चीज़ की ज़रूरत नहीं होती। बस शुरू में माला मन को थोड़ा बाँधकर रखती है, इतनी सी बात है।


फिर माला जपने का सही तरीका क्या है

सही तरीका बस तीन बातों में है। पहली बात, नाम ज़ुबान पर चलता रहे। दूसरी बात, दिल उससे जुड़ा रहे। और तीसरी बात, यह रोज़ हो, एक दिन भी छोड़े बिना। गिनती इन तीनों की मदद के लिए है, गिनती खुद मंज़िल नहीं है।

पहले नए साधक (seeker) की बात करते हैं। शुरुआत में मन बहुत भागता है, इसलिए एक तय नियम उसे सँभालकर रखता है:

"हमें नियम के अनुसार जपना हो, इतनी माला जपना है, इतने मिनट जपना है, तो फिर मन को हम बाँध सकते हैं।"

श्री प्रेमानंद जी महाराज

इसीलिए उन्होंने एक भक्त को ग्यारह माला का नियम दिया। किसी को पाँच माला अच्छी लगती है, किसी को इक्यावन। यह आप पर और आपके समय पर है। नियम ज़रूर रखिए, पर नियम को ही भगवान मत मान लीजिए। महाराज जी टोकते हैं कि गिनती को ही मंज़िल समझ लेना भूल है:

"इन संख्याओं से कोई मतलब है? हमें तो हर समय भगवान में लगे रहना है। जो संख्या बताई गई वो मन लगाने के लिए बताई गई। संख्या तो कोई है नहीं, बात है।"

श्री प्रेमानंद जी महाराज

और नाम दिल में कैसे बैठता है? जब ज़ुबान और मन, दोनों साथ चलें। ज़ुबान पर नाम चलता रहे, और मन में भगवान या गुरुदेव का रूप बना रहे। महाराज जी कहते हैं कि नाम ज़ुबान से चलता रहे और साथ में उनके रूप का ध्यान भी बना रहे। बस यही पूरा अभ्यास है। तोते की तरह रटना अलग बात है, और नाम से सच में जुड़ जाना अलग।

रही बात मनके, दिशा और उँगली की, तो वह हमारी पुरानी परंपरा है। अच्छी परंपरा है, पर वही सब कुछ नहीं। नीचे सवालों में उसे भी समझाया है। पहले यह मूल बात पकड़ लीजिए, बाकी सब अपने आप ठीक होता जाता है।

तुलसी माला पर नाम जप करता हाथ, माला जपने का सही तरीका, भाव के साथ
माला का काम याद दिलाना है। जप नाम का होता है, माला का नहीं।

गिनती रखें कैसे, माला से, उँगली से, या ऐप से?

गिनती रखने के तीन ईमानदार तरीके हैं, और तीनों सही हैं। पहला, सूत या तुलसी की माला। दूसरा, हाथ की उँगलियों की पोरों पर गिनना। तीसरा, कोई जप गिनने वाला ऐप। इनमें से जो आपको रोज़ बैठाकर नाम पर टिकाए रखे, वही आपके लिए सही है।

एक बात साफ़ समझ लीजिए। महाराज जी खुद अपनी गिनती नहीं गिनते:

"एक करोड़ हो गया है संख्या हमारी, हमें कोई दूसरा नहीं बताता। हम भी नहीं गिनते। प्रभु पर छोड़ा कि गिनने का काम आप करो, हम धुआँधार जपते हैं।"

श्री प्रेमानंद जी महाराज

तो गिनती एक सीढ़ी की तरह है। शुरू में उस पर चढ़िए, और जब नाम अपने आप बहने लगे, तो सीढ़ी पीछे छूट जाती है। पर उस दिन तक गिनती बहुत काम की है, क्योंकि वह जप को रोज़ बनाए रखती है, छूटने नहीं देती।

अब यहीं एक असली दिक्कत आती है। सूत की माला हाथ में हो और आप चलते-फिरते, बात करते, काम करते हुए जप करें, तो अक्सर मनका छूट जाता है और गिनती का हिसाब गड़बड़ा जाता है। बहुत से लोग इसी उलझन में आकर जप ही छोड़ बैठते हैं। ऐसे लोगों के लिए एक जप गिनने वाला ऐप सच्चा सहारा है। स्क्रीन बंद हो, तब भी वह गिनता रहता है, और आप गिनती की चिंता छोड़कर सिर्फ़ नाम पर ध्यान रख पाते हैं। ऐप माला की जगह नहीं लेता, वह बस उसी काम को थोड़ा आसान कर देता है, नाम याद दिलाना और जप को रोज़ बनाए रखना।


मन न लगे, नींद आए, गिनती छूट जाए, तब?

तब भी जप करते रहिए। मन न लगे, इससे जप बेकार नहीं हो जाता। शायद इस पूरी बात की सबसे बड़ी ग़लतफ़हमी यही है कि जब तक मन पूरा न लगे, तब तक जप का फल नहीं मिलता। महाराज जी इस डर को जड़ से मिटा देते हैं।

उनकी एक बात दिल में बैठ जाती है:

"हम रोटी खाएँ तो पेट भर जाएगा कि नहीं भर जाएगा? ऐसे ही हम नाम जप कर रहे हैं, ध्यान नहीं लग रहा, पर लाभ मिलेगा। भाव कुभाव अनख आलसहुँ, नाम जपत मंगल दिसि दसहुँ।"

श्री प्रेमानंद जी महाराज

पेट को यह देखना नहीं पड़ता कि आपने रोटी ध्यान से खाई या नहीं, वह तो भर ही जाता है। नाम भी बिलकुल वैसे ही काम करता है, भले मन इधर-उधर भटकता रहे:

"यह चिंता मत करो कि मन विषय-चिंतन करता है तो नाम का फल नहीं मिलेगा। नहीं, वह अविनाशी फल देता है। वह अपना काम करेगा।"

श्री प्रेमानंद जी महाराज

और शुरू में जो बेचैनी होती है, वह कोई बुरी बात नहीं है। महाराज जी की भाषा तो आज के आदमी वाली है:

"नाम पहले पापों को नष्ट करता है, इसलिए धैर्य रखो। हृदय जलेगा, मन नहीं लगेगा, गंदी बातें आएँगी। लगेगा पहले ऐसा नहीं आता था। नहीं आता था क्योंकि पहले स्टॉक जमा हो रहा था। अब नाम जप कर रहे हो, सब डिलीट हो रहा है।"

श्री प्रेमानंद जी महाराज

अब एक डर जो बहुत लोगों को सताता है। कल सौ नाम हुए थे, आज पचास ही हो पाए, कहीं यह नाम-अपराध तो नहीं? इस पर महाराज जी ने साफ़ कहा है कि जो दस नाम-अपराध बताए गए हैं, उनमें गिनती का कम हो जाना है ही नहीं। संत कहते हैं, कभी थोड़ा भजन होता है, कभी बहुत। धीरज मत छोड़िए, और कोई दूसरा रास्ता मत पकड़िए।

पर अगर सचमुच किसी दिन मन कहीं न लगे, कुछ भी न बन पा रहा हो? तो ज़बरदस्ती करके गंदे विचारों में मत उलझिए।

"मन लग ही नहीं रहा, कहीं कुछ नहीं बन रहा, तो सो जाएँ। हम अपराध न करें।"

श्री प्रेमानंद जी महाराज

सो जाना भी एक तरह की साधना है, अगर वह आपको अपराध से बचा ले। इतनी छूट देना महाराज जी की दया है।

असली माला तो रोज़ बने रहना है

एक आख़िरी बात, जो ऊपर की सारी बातों को एक जगह बाँध देती है। सही तरीका कोई एक ख़ास आसन या दिशा नहीं है। सही तरीका तो यह है कि आप रोज़ नाम से जुड़े रहें।

"चलते-फिरते, उठते-बैठते, खाते-पीते, सोते-जागते, हर समय निरंतर नाम।"

श्री प्रेमानंद जी महाराज

यह बड़ी बात लगती है, पर शुरुआत बहुत छोटी है। महाराज जी रस्सी और पत्थर की एक मिसाल देते हैं। कुएँ के ऊपर पड़ी सख़्त शिला पर बरसों तक रस्सी खिंचती रही, तो पत्थर पर भी निशान पड़ गया। हमारा मन तो पत्थर से कहीं नरम है। रोज़ थोड़ा-थोड़ा नाम लीजिए, निशान ज़रूर पड़ेगा।

मैंने अपने लिए यही तय किया है, रोज़ कम से कम एक माला, एक दिन भी छोड़े बिना। जिस दिन मन न लगे, उस दिन भी एक माला। भरोसा नाम पर रखता हूँ, अपने मन पर नहीं। बस इतनी सी बात है।

राधे-राधे।


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लेखक
Satish Sahu, jaapak.com लेखक
सतीश साहू

स्वतंत्र लेखक, jaapak.com

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व्याख्या सनातन परंपरा की सामान्य समझ पर आधारित है और सरल हिंदी में लिखी गई है। किसी आधुनिक टीकाकार का शब्दशः उद्धरण नहीं है।

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