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Jaapak
भगवद्गीताअध्याय 2

अध्याय 2: सांख्ययोग

Sānkhya Yog

इस अध्याय में 4 श्लोक हैं।

  1. 2.20
    न हन्यते हन्यमाने शरीरे: आत्मा की अजन्मता का सत्य

    'न हन्यते हन्यमाने शरीरे' — गीता 2.20 का वह सत्य जो मृत्यु-भय की जड़ काट देता है। आत्मा के चार गहरे आयामों की सरल व्याख्या।

  2. 2.47
    कर्मण्येवाधिकारस्ते — फल का असली सच क्या है?

    कर्मण्येवाधिकारस्ते का मतलब सिर्फ 'फल मत चाहो' नहीं है — इसमें कुछ और गहरा छुपा है। गीता 2.47 का असली अर्थ सरल हिंदी में।

  3. 2.48
    समत्वम् योग उच्यते — योगस्थः का असली मतलब

    'समत्वम् योग उच्यते' का असली अर्थ क्या है? गीता 2.48 में श्रीकृष्ण ने एक ऐसा समीकरण दिया जो योग की पूरी परिभाषा बदल देता है।

  4. 2.50
    योगः कर्मसु कौशलम् — पुण्य का असली सच

    क्या पुण्य कर्म भी बंधन बनाते हैं? गीता 2.50 में 'योगः कर्मसु कौशलम्' का वह अर्थ जो अधिकांश लोग नहीं जानते।