प्रेमानंद महाराज दीक्षा — असली भगवत झांकी
प्रेमानंद महाराज दीक्षा — सिर्फ़ मंत्र नहीं, जीवन की दिशा बदल देने वाली घटना। नाम जप की असली शुरुआत।

जब किसी को पहली बार premanand maharaj diksha की बात सुनते हैं, मन सोचता है, शायद कोई विशेष मंत्र मिलेगा, कोई साधना-विधि बताई जाएगी। लेकिन महाराज जी के सत्संग में बैठने पर समझ आता है कि दीक्षा तो एक घटना है, भीतर से जीवन की दिशा पलट जाने की घटना।
प्रेमानंद महाराज दीक्षा, नाम जप का आध्यात्मिक अर्थ
दीक्षा केवल गुरु-मंत्र का ग्रहण नहीं है। भजन मार्ग परंपरा में महाराज जी जो दीक्षा देते हैं, उसका केंद्र एक ही है: नाम जप को जीवन का प्राण बनाना। उठते-बैठते, चलते-फिरते, हर सांस में।

और जब साधक नाम जपने लगता है, एक जिज्ञासा स्वाभाविक रूप से जागती है। एक भक्त ने महाराज जी से पूछा था कि आपने और अन्य सिद्ध संतों ने भगवत दर्शन किए हैं, तो कृपया भगवान के रूप का वर्णन करें ताकि भगवत प्राप्ति जल्दी हो सके।
यह सवाल हम सबके मन का है।
इस जिज्ञासा का उत्तर देते हुए महाराज जी पहले एक गहरी बात कहते हैं, भगवान का रूप वाणी और बुद्धि की पहुंच से सर्वथा परे है।
भगवान का रूप, करोड़ कल्पों में भी वर्णन असंभव
महाराज जी कहते हैं कि भगवान और भगवान का रूप अनिर्वचनीय है। वो पंच भौतिक देह नहीं हैं, चिदानंदमय हैं। और चिदानंद का वर्णन पंच भौतिक वाणी से हो नहीं सकता।
हरिवंश महाप्रभु ने श्री जी के रूप का वर्णन करने की कोशिश की। ब्रज की एक सुंदरी को देखकर करोड़ लक्ष्मियां मूर्छित हो जाएं, ऐसी ब्रज सुंदरियां श्री जी को देखकर स्वयं ग्रीवा झुका लेती हैं। और फिर भी उस रूप का वर्णन...
"जो कोटि कलप लगी जीवे रसना कोटिक पावे, तउ रुचिर बदनारबिंद की शोभा कहत न आवे।"
4:42
करोड़ कल्पों तक जीते रहो, करोड़ रसनाएं हों, तब भी प्रियाजी के मुखारविंद की शोभा का वर्णन नहीं होगा।
महाराज जी एक और बात कहते हैं। जिन नेत्रों ने देखा, उनकी वाणी नहीं रही। जो वाणी बोल रही है, उसने देखा नहीं। इसीलिए जो भी वर्णन हुआ है, वो बाहरी रूप है। और वो रूप जो चित्रकार ने बनाया? वो उसकी भावना है। कोई स्याही ऐसी नहीं बनी जो श्री कृष्ण के श्याम चिदानंद रंग को सच्चे अर्थ में दर्शा सके।
शास्त्र, काव्य, महाकाव्य, सब संकेत हैं। सच्चा स्वरूप नहीं।
नाम जप ही भगवान के सच्चे रूप का एकमात्र प्रकाशक
तो जब वाणी इतनी असमर्थ है, फिर भगवान के सच्चे रूप तक पहुंचने का मार्ग क्या है? यहीं पर महाराज जी एक गहरा उत्तर देते हैं:

"सही रूप का परिचय नाम कराता है। जैसे आप राधा राधा राधा राधा जपेंगे, तो जो राधा रूप आएगा; जो कृष्ण कृष्ण जपने से कृष्ण रूप आएगा, वही! आज तक कोई ऐसा रूप नहीं।"
5:25
यह सुनकर ठहर जाना पड़ता है (मैं भी पहले यही सोचता था कि पहले रूप समझ में आए, फिर जपूंगा)। लेकिन महाराज जी का संकेत उलटा है। रूप नहीं मिला तो पहले जपो। रूप नाम से मिलेगा, नाम से पहले नहीं।
आज तक कोई चित्रकार, कोई कवि, कोई मूर्तिकार ऐसा प्रामाणिक रूप नहीं दे सका। जो नाम जप से प्रकट होता है, वही स्थायी है, वही चिदानंदमय है।
महाराज जी कहते हैं, चिर स्थायी चिदानंद रूप देखने के लिए खूब नाम जप करो। नाम जप भगवान को बाहर से पुकारना नहीं है। यह उनका सीधा, प्रामाणिक परिचय पाने की दिव्य साधना है।
माँ और बच्चे की कथा, सच्ची लालसा ही भगवत प्राप्ति की कुंजी
परंतु यह नाम जप की साधना फलीभूत होती है तब, जब साधक में सच्ची लालसा हो। और यही सबसे दुर्लभ बात है।

महाराज जी एक बड़ी सुंदर कथा सुनाते हैं। एक छोटा बच्चा रोने लगे, तो माँ पहले खिलौना देती है। अगर खिलौनों में राजी हो गया, माँ अपने काम में मस्त। फिर भी रोए तो बहन को भेजती है। उसकी गोद में भी न माने, तब माँ खुद दुलार करने आती है।
भगवान भी ठीक ऐसे ही करते हैं। पहले माया के खिलौने, धन, यश, प्रतिष्ठा। फिर रिद्धियां-सिद्धियां। लाखों में कोई एक होता है जो इन सबसे भी नहीं मानता। तब भगवान कहते हैं, "अब ये नहीं मानेगा, मुझे मिलना ही पड़ेगा।"
प्यासे को रबड़ी पिलाई जाए, वो नहीं पिएगा। उसे पानी चाहिए। ऐसे ही जिसे सच्चे में भगवान चाहिए, उसे ब्रह्मा के भोग भी विषम लगते हैं।
महाराज जी का संकेत साफ है, मिलने की राह सरल है, पर मिलने की सच्ची चाह दुर्लभ है। यही असली लालसा साधक के भीतर जागे, यही दीक्षा की पहली शर्त है।
भैया, यह लालसा नाम जप से, सत्संग से, भगवत लीला-कथा के श्रवण से जागती है।
दीक्षा की तैयारी, षड्विकारों से मुक्त हृदय में भगवान का वास
यह लालसा जाग उठे, इसके लिए साधक को अपना अंतःकरण शुद्ध करना होता है। यही दीक्षा की वास्तविक पूर्वतैयारी है।
काम, क्रोध, मद, मान, लोभ, मोह, जब तक ये हृदय में हैं, भगवान वहां कैसे वास करेंगे? पर-स्त्री को माँ के समान देखना, पराए धन को विष के समान जानना, यह बाहरी नियम नहीं है। जब भगवान प्राण-प्रिय बनते हैं, तो ये भाव खुद-ब-खुद आते हैं। कपट और दंभ छूट जाते हैं।
महाराज जी इस भाव को रामचरितमानस की उस प्रसिद्ध चौपाई से जोड़ते हैं जिसमें भगवान कहते हैं कि जिस हृदय में काम, क्रोध, मद, मान, मोह, लोभ, शोक, राग और द्रोह न हो, और जिसमें कपट, दंभ और माया का स्थान न हो, उसी हृदय में रघुनाथ स्वयं आकर निवास करते हैं।
इस एक भाव में पूरी दीक्षा की तैयारी समाई है। न राग, न द्वेष, न कपट, न दंभ, ऐसे हृदय में भगवान स्वयं वास करते हैं।
और यह षड्विकारों पर विजय आती कहां से है? नाम जप से। जब नाम जप डट के होता है, सब पापों का नाश होकर निर्विकारता स्वाभाविक रूप से आती है। मलिन मन में कामना होती है, निर्मल मन में निष्कामता।
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निष्कर्ष: प्रेमानंद महाराज दीक्षा का सार, नाम जप ही पथ
जब नाम जप गहराता है और हृदय शुद्ध होता है, तब साधक का जीवन बदल जाता है। बाहर से देखने में वो दुखी लग सकता है। दिन में चैन नहीं, रात को नींद नहीं। पर यही व्याकुलता साधना की पहचान है।
"सुखिया सब संसार है, खावे और सोवे। दुखिया दास कबीरा, जागे और रोवे।"
17:00
भगवान का रूप अनिर्वचनीय है, यह स्वीकार करना ही पहली समझ है। नाम जप वह दिव्य माध्यम है जो सीधे भगवान का परिचय कराता है, इसका कोई विकल्प नहीं। सच्ची लालसा जगाएं, हृदय शुद्ध करें, नाम जप में लगे रहें, यही महाराज जी की दीक्षा का समग्र सार है।
यदि आप भी इस मार्ग पर चलना चाहते हैं, तो आज से ही राधा-राधा जपना शुरू करें। एक-एक नाम, जैसा महाराज जी कहते हैं, संसार से वैराग्य और स्वरूप का बोध और भगवान से प्रेम, सब कुछ दे सकता है।
राधे-राधे।
स्रोत: #962 Ekantik Vartalaap & Darshan⧸ 06-07-2025⧸ Shri Hit Premanand Govind Sharan Ji Maharaj
यह लेख श्री प्रेमानंद जी महाराज के सत्संगों से संकलित है। मूल वीडियो ऊपर के लिंक में उपलब्ध है। इस लेख के सभी चित्र डिजिटल रूप से तैयार किए गए हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

स्वतंत्र लेखक, jaapak.com
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