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निकुंज क्या है? राधा-कृष्ण का निज स्थान

निकुंज क्या है? कुंज, निकुंज, निभृत निकुंज में क्या भेद? श्री मोहित मराल गोस्वामी की व्याख्या।

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श्री मोहित मराल गोस्वामी — निकुंज का रहस्य | श्री राधा-कृष्ण की निज स्थली जहाँ चौथे का प्रवेश नहीं

निकुंज क्या है — और यह वृंदावन की दूसरी जगहों से अलग कैसे? कभी सोचा है कि वृंदावन में ऐसी कोई जगह है जहाँ भगवान भी अपनी मर्ज़ी से नहीं, किसी और की मर्ज़ी से विराजते हैं? जहाँ प्रवेश के लिए न तो तप काम आता है, न विद्या, न कोई एंट्रेंस एग्ज़ाम — बस एक चीज़ चाहिए। और वो चीज़ क्या है, ये बात सुनकर शायद आप रुक जाएँ।

श्री मोहित मराल गोस्वामी जी ने हित वार्ता में निकुंज का ऐसा रहस्य खोला है जो सुनने वाले के रोम-रोम में सिहरन भर दे। बात सीधी है — निकुंज श्री राधा-कृष्ण का वो निज स्थान है जहाँ चौथे का प्रवेश नहीं। केवल प्रिया लाल, उनकी सहचरियाँ, और श्री वृंदावन। बस।

निकुंज क्या है — प्रिया लाल का निज बाग

निकुंज कोई साधारण स्थान नहीं। ये वो जगह है जहाँ श्री राधा जी और श्री कृष्ण अपनी सहचरियों के संग विराजमान हैं। अपनी लीलाएँ कर रहे हैं, अपनी केलि कर रहे हैं।

गोस्वामी जी बताते हैं कि वृंदावन के भी कई रूप हैं — एक ब्रज वृंदावन, जो पूरे ब्रज मंडल को कहते हैं। उसकी हृदय स्थली है ये वृंदावन धाम। और इसकी भी हृदय स्थली है वो निज वृंदावन — प्रिया लाल का निज बाग।

"निकुंज में केवल प्रिया लाल, उनकी सहचरी और श्री वृंदावन — इनके अलावा चौथे का प्रवेश नहीं।"

— श्री मोहित मराल गोस्वामी जी

3:02

श्री हरिवंश महाप्रभु ने इस वृंदावन को निकुंज की प्रतिरूपी — एक कॉपी — के रूप में स्थापित किया है। यहाँ आकर साधक अभ्यास करे। वैसी भावना रखे, वैसी चेष्टा करे, वैसी उमंग जगाए जो वहाँ सखियों की है। और जब इसमें परिपक्वता आ जाए, प्रिया लाल और सहचरियों की कृपा से, तब निकुंज में प्रवेश मिलता है।

वृंदावन का पुष्पित कुंज — राधा-कृष्ण की लीला-स्थली
वृंदावन के घने कुंज — जहाँ केवल राधा-कृष्ण की दृष्टि पहुँचती है।

निकुंज पहुँचें कैसे? — शरणागति से शुरू होता है सब कुछ

गोस्वामी जी ने इसे बड़े practical तरीके से समझाया। जैसे 12th के बाद IIT में admission चाहिए तो entrance exam clear करना पड़ता है, एलिजिबल होना पड़ता है — ठीक वैसे ही निकुंज का भी एक sequence है।

सबसे पहले — शरणागति।

शरणागति माने पूर्ण रूप से उनकी शरण में। कहीं भी अगर अपनी चलती है तो वो शरणागति नहीं। गोस्वामी जी की बात सीधी है — जब तक "मेरा" बचा है, तब तक शरणागति अधूरी है।

शरणागति परिपक्व होने पर निजता मिलती है। निज मंत्र मिलता है। लेकिन यहाँ एक बात बहुत गहरी कही गई —

"इतनी माला कर लोगे या इतना समय हो जाएगा तो तुम्हें निज मंत्र प्राप्त हो जाएगा — ऐसा नहीं है। जब तक मन नहीं बदलेगा, जब तक स्वभाव नहीं बदलेगा, तब तक लेने की चेष्टा भी नहीं करें।"

7:26

ये सुनकर थोड़ा ठहरिए। बहुत से लोग निज मंत्र के लिए गुरु से माँगते रहते हैं। गोस्वामी जी कहते हैं कि ये माँगने की चीज़ नहीं है। ये कृपा दत्त विषय है। (मुझे भी पहले लगता था कि नियमित जप से अपने-आप मिल जाएगा — लेकिन ये बात सुनकर समझ आई कि मन बदलना पहले है, बाकी सब बाद में।)

चाबी वाला उदाहरण — जो बात हृदय में बैठ जाए

गोस्वामी जी ने एक उदाहरण दिया जो बहुत गहरा है।

मान लीजिए किसी के घर में कई सेवक हैं — झाड़ू लगाने वाला, बर्तन माँजने वाला, गाड़ी वाला। सब सेवक हैं, सब शरणागत हैं। लेकिन क्या घर का मालिक अपनी जेब से चाबी निकालकर किसी भी सेवक को देगा कि जाओ, लॉकर से सौ की गड्डी निकाल लाओ?

नहीं।

वो चाबी केवल उस सेवक को मिलती है जिस पर मालिक का पूरा भरोसा हो। और ये भरोसा सेवक की तरफ से नहीं बनता — मोहर उधर से लगती है।

"कौन सा ऐसा सेवक रहता है कि घर का मालिक अपनी जेब में से चाबी निकाल के दे और कहे कि लॉकर में सौ की गड्डी रखी है, वो निकाल के ले आओ?"

5:53

निज मंत्र वो चाबी है। और ये चाबी कृपा से मिलती है, माँगने से नहीं। सेवक कितना भी कहता रहे "मैं निकाल लाता हूँ" — मालिक तब तक नहीं देगा जब तक अपने आप न समझे कि ये लायक है।

कुंज, निकुंज और निभृत निकुंज — तीन अलग-अलग स्थान

ये भेद बहुत महत्वपूर्ण है और बहुत कम लोग इसे ठीक से समझते हैं।

गोस्वामी जी ने घर के उदाहरण से समझाया — मान लो बाहर का गार्डन है, जहाँ सब आते-जाते हैं। ग्वाल बाल हैं, गैया हैं, बछड़े हैं। सब खेल रहा है। ये है कुंज।

अब अंदर जाओ — लिविंग रूम है। यहाँ हर कोई नहीं पहुँचता, restricted लोग ही आते हैं। यहाँ केवल सखियाँ और प्रिया लाल। ये है निकुंज।

और उससे भी अंदर — बेडरूम। जहाँ केवल प्रिया लाल और हित सजनी (वंशी जी)। अष्ट सखियों का भी यहाँ प्रवेश नहीं। ये है निभृत निकुंज।

तीन स्तर। बाहर से अंदर की ओर — कुंज → निकुंज → निभृत निकुंज। हर स्तर पर access कम होती जाती है, अंतरंगता बढ़ती जाती है।

फूलों से सजे राधा-कृष्ण विग्रह — निकुंज की झांकी
जहाँ ठाकुर जी और प्रिया जी की अंतरंग सेवा होती है — वही निकुंज।

सखियों की संख्या — गिन ही नहीं सकते

गोस्वामी जी ने बताया कि ध्रुवदास जी 42वीं लीला में कहते हैं — आप आकाश से गिरने वाली बारिश की बूँदों को गिन लो, रज के कणों को गिन लो, तारों को गिन लो — लेकिन सखियों की संख्या नहीं गिन सकते।

एक लाख सखियों का एक यूथ (समूह)। हर यूथ की एक head सखी। और ऐसे अनगिनत यूथ।

मुख्य रूप से आठ सखियाँ हैं — ललिता, विशाखा, चम्पकलता, तुंगविद्या, रंगदेवी, सखी सुदेवी, इन्दुलेखा, और चित्रा। इनके अलावा नौवीं हैं वंशी अली — जो हित सजनी हैं।

जब प्रिया लाल निभृत निकुंज में जाते हैं, तब हित सजनी वंशी जी के रूप में विराजमान रहती हैं। और जब बाहर आते हैं जहाँ अष्ट सखियाँ हैं, तो वहाँ वो वंशी के रूप में सेवा में तत्पर रहती हैं।

निकुंज दर्शन — अपने नैनों से नहीं होंगे

एक भक्त ने पूछा — कर्म और भजन देखकर तो नहीं लगता कि निकुंज मिलेगा, पर बहुत इच्छा है कि एक बार दर्शन हो जाएँ। क्या प्रकट में निकुंज के दर्शन हो सकते हैं?

गोस्वामी जी का जवाब सुनकर रोंगटे खड़े हो गए। वृंदावन की ठंडी सुबह में ये प्रवचन सुनना कुछ और ही अनुभव रहा होगा।

अपने नैनों से नहीं हो सकते। उसके लिए लेंस लेना पड़ेगा। कौन सा लेंस? हरिवंश महाप्रभु के नैन।

और ये नैन कहाँ मिलते हैं? उनकी वाणी में।

"उनकी वाणी को आत्मसात कर लो, उसको समझ लो, उसको हृदयस्थ कर लो, अपने रोम-रोम में बसा लो — अपने आप वो लेंस लग जाएगा। उनके नैन लग जाएंगे।"

13:02

बात सीधी है। हरिवंश महाप्रभु की वाणी ही वो माध्यम है जिससे वृंदावन, कुंज, निकुंज, निभृत निकुंज, सबके दर्शन सम्भव हैं। बस उस वाणी को रोम-रोम में उतारना है।

निकुंज प्राप्ति का सार — एक नज़र में

  • शरणागति पूर्ण हो — कहीं भी "अपनी" न चले
  • महामंत्र का अभ्यास — श्री राधावल्लभ, श्री हरिवंश, श्री वृंदावन, श्री वनचन्द
  • मन और स्वभाव बदले — सिर्फ़ माला गिनने से कुछ नहीं होगा
  • निज मंत्र कृपा से मिले — माँगने से नहीं, लायक बनने से
  • हरिवंश महाप्रभु की वाणी हृदयस्थ हो — यही दर्शन का लेंस है
  • सब कुछ करने के बाद भी — निकुंज प्राप्ति कृपा दत्त विषय है। गुरु कृपा और इष्ट कृपा के बल पर ही पहुँचा जा सकता है

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Satish Sahu — jaapak.com लेखक
सतीश साहू

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इस लेख के बारे में

व्याख्या सनातन परंपरा की सामान्य समझ पर आधारित है और सरल हिंदी में लिखी गई है। किसी आधुनिक टीकाकार का शब्दशः उद्धरण नहीं है।

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