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नाम जप कैसे शुरू करें: नए जापक के 25 सवाल

नए जापक के 25 सवाल — नाम बनाम मंत्र, माला या काउंटर, मन नहीं लगता? एक साधक की निजी डायरी।

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नए जापक की पूरी गाइड — माला, काउंटर, मंत्र, समय के 25 सवालों के जवाब | जापक डायरी

दो साल पहले मैंने पहली बार नाम जप के लिए माला उठाई थी। यकीन मानिए, आज आप जो सवाल अपने मन में लिए बैठे हैं, मेरे मन में भी वही थे।

"माला ज़रूरी है या बिना माला भी जप हो जाता है?" "कौन सा मंत्र लूँ — ओम नमः शिवाय या राधा नाम या राम नाम?" "काउंटर से करूँ तो गलत तो नहीं?" "रोज़ कितनी माला करनी चाहिए — 1, 5, 11?" "बैठता हूँ तो मन भागता क्यों है?" "घर में कोई देखेगा तो?"

मैं एक महीने तक बस यही सवाल पूछता रहा। यूट्यूब खंगाला, सत्संग सुने, बड़े-बूढ़ों से पूछा। और धीरे-धीरे जो सीखा, जो खुद पर आज़माया, जो काम किया, वो सब आज लिख रहा हूँ। एक ही जगह। ताकि जो नया जापक आज मेरी जगह खड़ा है, उसे वो भटकाव न झेलना पड़े जो मैंने झेला।

चलिए शुरू से शुरू करते हैं।


शुरू करने से पहले: नाम जप और मंत्र जप में क्या अंतर है?

यह पहला भ्रम है जो मेरा भी था। "मैं क्या कर रहा हूँ — नाम जप या मंत्र जप? दोनों एक हैं या अलग?"

थोड़ा समय लगा समझने में। अब सीधा बताता हूँ।

मंत्र जप{rel="noopener" target="_blank"}। यह शास्त्रीय पद्धति है। मंत्र यानी एक निश्चित शब्द-समूह जिसमें बीज अक्षर होते हैं (ॐ, ऐं, ह्रीं, क्लीं जैसे)। गायत्री मंत्र, महामृत्युंजय, नवार्ण, श्री सूक्त: ये सब मंत्र हैं।

मंत्र जप के नियम सख़्त होते हैं:

  • गुरु-दीक्षा से लिया हुआ मंत्र अधिक प्रभावी
  • शुद्ध उच्चारण ज़रूरी, अर्थ-ज्ञान हो तो बेहतर
  • आसन, दिशा, समय के विशिष्ट नियम
  • अशुद्ध अवस्था में जप नहीं (बिना स्नान, मासिक धर्म में, आदि)
  • गलत उच्चारण या गलत विधि का उलटा असर भी हो सकता है

नाम जप बिल्कुल अलग है। भक्ति पद्धति। बस भगवान का नाम लेना: राधे, राम, कृष्ण, शिव, हरि, हनुमान। बीज अक्षर नहीं, विशेष विधि नहीं।

नाम जप में कोई कड़े नियम नहीं:

  • कहीं भी, किसी भी अवस्था में
  • कोई उच्चारण-भूल का दंड नहीं
  • दीक्षा अनिवार्य नहीं
  • श्वास-श्वास में चलाओ, मन में चलाओ, बोलकर चलाओ। सब मान्य।

दोनों में बेहतर कौन?

श्री प्रेमानंद जी महाराज{rel="noopener" target="_blank"} बार-बार स्पष्ट करते हैं: "कलियुग में नाम ही एकमात्र साधन है।" और "नानक नाम जहाज है, चढ़े सो उतरे पार।"

क्यों नाम को वरीयता दी गई? एक वजह है, और बहुत साफ़ है।

आज हमारे पास न शुद्ध संस्कृत उच्चारण की क्षमता है, न सच्चे गुरु तक पहुँचने का समय, न यज्ञ-तंत्र-विधि सीखने का अवसर। पर नाम तो हर पल चल सकता है। श्वास-श्वास में। खाते-सोते-चलते। पेट ख़राब हो, पीरियड हों, स्नान न किया हो, फिर भी मन में नाम चलता रह सकता है। यही नाम की शक्ति है। बिना शर्त उपलब्ध।

महाराज जी का एक सूत्र जो मुझे छू गया:

"हमारे जीवन में बस एक ही बात रह गई — नाम, नाम, नाम, नाम। हर प्रश्न का उत्तर आपको नाम में मिलेगा।"

और ॐ नमः शिवाय? — यहाँ मैं रुककर एक ज़रूरी बात बताऊँगा।

शुरू में मैं भी यही सोचता था कि ॐ नमः शिवाय एक शिव-नाम है, सीधे जप लो। पर महाराज जी ने इस बारे में बहुत साफ़ निर्देश दिया है — और मुझसे एक मित्र ने यही सवाल पूछा था।

महाराज जी का उत्तर है:

"पंचाक्षरी मंत्र है — किसी गुरु से मंत्र लो और फिर उच्चारण मत करो।"

यानी ॐ नमः शिवाय बिना गुरु-दीक्षा के नहीं जपना चाहिए, और दीक्षा के बाद भी उच्चारण नहीं, केवल मन में। यह पंचाक्षरी मंत्र है, नाम नहीं — वर्ग अलग है।

तो गुरु मिलने तक क्या जपें? महाराज जी का ही मार्गदर्शन:

"साम सदा शिव जपो, और किसी शिव उपासक को गुरु रूप में वरण करो। फिर उनसे पंचाक्षरी मंत्र लो, फिर जपो। हाँ, सिद्धांत से चलो, मनमानी मत करो।"

साम सदाशिव मंत्र भी मन में ही जपें, ज़ोर से नहीं — यह भी महाराज जी ने कहा है।

यह बड़ी बात है। सीधे ॐ नमः शिवाय जप लेने का मन हो तो रुकिए। यह मनमानी कही गई है।

नए जापक के लिए मेरी सीधी सलाह: नाम जप से शुरू करें — राधे राधे, श्री राम, हरे कृष्ण। ये नाम हैं, मंत्र नहीं — बिना दीक्षा खुले हैं। और शिव भक्त हैं तो साम सदाशिव मन में चलाइए, साथ-साथ शिव उपासक गुरु की तलाश करिए। गुरु मिले तब दीक्षा से पंचाक्षरी लीजिए।

पहले 3-6 महीने: सिर्फ़ नाम। राधे राधे। राम राम। हरे कृष्ण। मन में साम सदाशिव। एक को पकड़िए, मन को साधिए। जब रस आने लगे और गुरु मिल जाए, तब दीक्षा लेकर मंत्र जप — गायत्री, महामृत्युंजय, पंचाक्षरी, नवार्ण — सही विधि से।

अब इस समझ के साथ, चलिए उन 25 सवालों की तरफ़ जो आपको परेशान कर रहे हैं।


पहले वाले तीन सवाल: जो सबसे ज़्यादा पूछे जाते हैं

1. सबसे पहला मंत्र कौन सा लूँ?

यहीं पर अधिकतर लोग फँसते हैं। नई किताब उठाते हैं, कोई नवार्ण मंत्र दिख जाता है, "ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे" — लगता है कठिन मंत्र से जल्दी असर होगा। और अगले दिन बुखार, कमज़ोरी, मन उचाट।

मैंने यही गलती की थी।

ऊपर जो बात मैंने कही — मंत्र जप गुरु-दीक्षा माँगता है, नाम जप खुला है — वही यहाँ भी लागू होती है।

बिना गुरु के मंत्र (जैसे ॐ नमः शिवाय, गायत्री, महामृत्युंजय, नवार्ण) नहीं शुरू करना चाहिए। महाराज जी ने इसे "मनमानी" कहा है। पर नाम कोई भी ले सकता है, कहीं भी, किसी भी अवस्था में।

तो पहले दिन क्या बोलें? मेरी व्यक्तिगत सलाह (आपके इष्ट के हिसाब से) —

  • कृष्ण/राधा भक्त हैं?राधे राधे, हरे कृष्ण, जय श्री राधे
  • राम भक्त हैं?श्री राम जय राम जय जय राम
  • शिव भक्त हैं?साम सदाशिव (मन में, ज़ोर से नहीं) — महाराज जी का सीधा निर्देश यही है जब तक गुरु न मिले
  • हनुमान भक्त हैं?जय श्री राम, जय हनुमान
  • देवी भक्त हैं?जय माता दी, जय माँ
  • इष्ट तय नहीं?हरे कृष्ण या राधे राधे शुरू कर दीजिए — सबसे खुले नाम हैं।

पहले 40 दिन बस एक नाम, वही नाम, रोज़ एक समय। बीज मंत्र, पंचाक्षरी, नवार्ण, महामृत्युंजय: गुरु-दीक्षा के बाद। नींव पहले, मंत्र उसके बाद।

देवता के अनुसार: कौन सा नाम आपके लिए (गुरु मिलने तक)

यह सूची सिर्फ़ नाम जप की है — बिना दीक्षा खुले, हर अवस्था में जपने योग्य। बेसिक मंत्रों की कॉलम इसलिए नहीं दी कि वे सब गुरु-दीक्षा माँगते हैं, और हर एक की अपनी विधि है। गुरु मिलेंगे तो वही बताएँगे।

इष्ट देवनाम जप (बिना दीक्षा, मन में या धीरे-से)
शिवसाम सदाशिव (मन में), हर हर महादेव
हनुमानजय श्री राम, जय हनुमान
रामश्री राम जय राम जय जय राम
कृष्णहरे कृष्ण हरे कृष्ण, राधे राधे
राधा रानीराधे राधे, जय श्री राधे
विष्णुजय नारायण, जय श्री हरि
दुर्गा / देवीजय माता दी, जय माँ
गणेशजय गणेश, गणपति बप्पा
इष्ट तय नहींराधे राधे या हरे कृष्ण — सबसे खुले नाम

कुछ काम की बातें:

  • नए जापक हैं? ऊपर वाली नाम जप कॉलम से शुरू करिए। मंत्र — पंचाक्षरी (ॐ नमः शिवाय), द्वादशाक्षर (ॐ नमो भगवते वासुदेवाय), गायत्री, नवार्ण, महामृत्युंजय — ये सब गुरु-दीक्षा के बाद ही। महाराज जी ने स्पष्ट कहा है: बिना गुरु मंत्र जपना "मनमानी" है।
  • शिव भक्त हैं, गुरु नहीं है? महाराज जी का सीधा निर्देश — साम सदाशिव मन में जपते रहो, ज़ोर से नहीं। साथ-साथ किसी शिव उपासक को गुरु रूप में वरण करो, फिर उनसे पंचाक्षरी लो।
  • राधा-कृष्ण भक्त हैं? महाराज जी बार-बार कहते हैं — "राधे राधे" हर प्रश्न का उत्तर है। दिनभर चलाइए।
  • हनुमान भक्त हैं? जय श्री राम + साप्ताहिक हनुमान चालीसा (मंगलवार-शनिवार)।

एक बात साफ़ रखिए। एक इष्ट, एक नाम, एक मंत्र। (और इसी में सब बिखरता है जब लोग रोज़ देवता बदलते हैं।) आज शिव, कल विष्णु, परसों देवी: ऊर्जा बिखरती है। जो पहले 3-6 महीने के लिए चुना, उसी पर टिकिए। बाद में अन्य देवताओं का स्मरण सहज आता जाता है।

2. माला से करूँ या बिना माला?

यह सवाल मुझे महीनों तक तंग करता रहा। हर वीडियो में कोई कहता "माला बिना जप पूरा नहीं", कोई कहता "मन का जप सर्वश्रेष्ठ है"।

सच्चाई बीच में है।

शुरुआत में माला ज़रूर रखें। क्यों? क्योंकि नए मन को संख्या का सहारा चाहिए। माला के मनके गिनते-गिनते हाथ को, आँख को, मन को एक कड़ी मिल जाती है। आप बैठे हैं, एक काम है, और जब तक माला पूरी नहीं होगी तब तक उठेंगे नहीं। यह अनुशासन माला से आता है।

लेकिन महाराज जी जो बताते हैं: "जप कभी बोलकर नहीं होता। मन में चलता है हमेशा। होंठ भी नहीं हिलने चाहिए।" यह आगे की बात है। पहले हाथ में माला, होंठ स्थिर, मन में नाम। तीनों एक साथ।

नए जापक की सादा व्यवस्था — लाल या पीला आसन, रुद्राक्ष या तुलसी माला, सामने दीया और इष्ट की छोटी तस्वीर
शुरुआत के लिए सब कुछ यही — आसन, माला, दीया। ज़्यादा चाहिए भी नहीं।

जब नाम अपने आप श्वास-श्वास में चलने लगे, तब माला की ज़रूरत घटने लगती है। महाराज जी के शब्दों में:

"जब प्रत्येक श्वास में निरंतर नाम अभ्यास होने लगे, तब वो अव्यावहारिक दशा हो जाती है — जैसे पलक झपकना, जैसे दिल का धड़कना।"

उस अवस्था तक पहुँचने में सालों लगते हैं। तब तक माला आपकी साथी है।

3. काउंटर से जप करूँ या नहीं?

आजकल हर कोई काउंटर से जप कर रहा है: अंगूठे में एक छोटा सा यंत्र, क्लिक-क्लिक-क्लिक। सुबह ऑफिस जाते, मेट्रो में, पैदल चलते। नंबर बढ़ते जाते हैं।

इस बारे में मेरी ईमानदार राय।

काउंटर का एक फायदा है। यह जप याद दिलाता है। नौकरीपेशा, छात्र, गृहस्थ जिनके पास आसन बिछाकर बैठने का एक घंटा नहीं मिलता, उनके लिए काउंटर एक सहारा है। अगर दिन में पाँच बार भी काउंटर देखकर राधा राधा बोल लिया, कुछ तो हुआ।

लेकिन काउंटर का नुक़सान बड़ा है। अभिमान। "आज तो मैंने एक लाख कर दिए।" "दो लाख हो गए इस हफ़्ते।" नंबर दिखते ही मन में गिनती घुस जाती है। गिनती घुसते ही भाव गिर जाता है। और जप का सार ही भाव है।

बड़े संतों को ज़रा देखिए। महाराज जी खुद, राजेंद्र दास जी महाराज — क्या आपने कभी उनके हाथ में काउंटर देखा? नहीं। क्योंकि उनके मन में नाम अपने आप चलता है। गिनने की ज़रूरत नहीं।

मैंने क्या किया था: पहले छह महीने सिर्फ़ माला। काउंटर को हाथ भी नहीं लगाया। क्यों? मुझे पहले बैठने की आदत डालनी थी, गिनने की नहीं। आसन पर टिकना सीखा, फिर एक साल बाद कभी-कभार यात्रा में काउंटर रखने लगा। पर आज भी सुबह का जप बिना काउंटर, बिना गिनती, बस माला के साथ।

सीधी बात: काउंटर बुरा नहीं है, पर शुरुआत काउंटर से मत कीजिए। पहले आसन पर बैठिए। पहले माला सीखिए। काउंटर तब जब आसन वाला जप जम जाए।


आसन, माला, बैठने की विधि

4. कहाँ बैठूँ? सोफा चलेगा, बिस्तर चलेगा?

नहीं। और यह मेरी सबसे बड़ी गलती थी।

पहले दो महीने मैं बिस्तर पर बैठकर जप करता रहा। सर्दी थी, ज़मीन ठंडी थी, बिस्तर आरामदायक लगता था। पर मन लगता ही नहीं था। पैर फैल जाते, नींद आ जाती, जप आधे में बंद।

जब आसन बिछाना शुरू किया (एक मोटा सूती कपड़ा, सिर्फ़ जप के लिए), सब बदल गया।

क्यों? हमारे शरीर में ऊर्जा है। जप से वह ऊर्जा बढ़ती है। अगर सीधे ज़मीन पर, सोफ़े पर, बिस्तर पर बैठे, तो वह ऊर्जा नीचे अवशोषित हो जाती है। आसन बिछाने से वह ऊर्जा लॉक हो जाती है: आप पर, आपके शरीर में, आपकी साधना में।

5. आसन का रंग: यह सच में मायने रखता है?

हाँ। मैंने भी पहले नहीं माना था।

सही रंग: लाल, पीला, सफ़ेद। ये उजले, सात्त्विक रंग हैं। ऊर्जा खींचते हैं, सकारात्मकता देते हैं।

गलत रंग: काला, नीला, गहरा भूरा। ये तमस के रंग हैं। तांत्रिक साधनाओं में इनका उपयोग होता है। नए जापक को इनसे दूर रहना चाहिए।

मेरे घर में पुराना नीला कंबल था, मैंने उसी को आसन बना लिया था। एक साधु जी ने बताया: "इसे बदलो। लाल या पीला लो।" बदला तो मन एकदम जमने लगा।

6. माला कौन सी लूँ: किस देवता के लिए?

यह चार्ट याद रख लीजिए। बहुत काम आएगा।

देवताउपयुक्त माला
शिव जी, हनुमान जी, देवी माँरुद्राक्ष (5 मुखी)
विष्णु, राम, कृष्णतुलसी (पर प्याज-लहसुन-मांस त्यागना होगा)
विष्णु, कृष्ण (वैकल्पिक)सफ़ेद चंदन या कमलगट्टा
दुर्गा माँ, कालीरक्त चंदन या रुद्राक्ष
सामान्य/शुरुआतस्फटिक (सबके लिए चलती है)

शुरुआत में स्फटिक की 108 मनके की माला सबसे सुरक्षित है — यह हर इष्ट के लिए चलती है। 300-500 रुपए में ऑनलाइन मिल जाती है। बहुत महँगी, बहुत सजी-धजी माला शुरू में नहीं चाहिए। कृष्ण/राम/विष्णु भक्त हैं तो तुलसी भी अच्छी, बस प्याज-लहसुन-मांस छोड़ना होगा।

एक ग़लती जो मैंने देखी है: लोग विष्णु/कृष्ण जप रुद्राक्ष माला पर करते हैं। यह उचित नहीं। रुद्राक्ष शिव का है, तुलसी या चंदन विष्णु का। माला और देवता मेल खाने चाहिए, नहीं तो कहते हैं फल पूरा नहीं मिलता।

7. रोज़ कितनी माला करूँ?

शुरुआत: 1 माला (108 नाम)। यही काफ़ी है।

सुनिए, मैं बहुत से नए जापकों को देखता हूँ जो पहले ही दिन 11 माला करने बैठ जाते हैं। अगले दिन पैर दर्द, पीठ दर्द, और तीसरे दिन से बंद। बेशक यह बड़ी गलती है।

पहली माला आराम से। 10-15 मिनट। यही पूरी साधना है। जब यह 11 दिन तक बिना रुके हो जाए, तब 2 माला बढ़ाइए। फिर धीरे-धीरे 5, 11 तक। एक महीने में 11 माला भी बहुत है।

महाराज जी ने एक बार कहा था: "जो व्यक्ति भगवान के लिए 20 मिनट बैठा है, भगवान उस पर ज़्यादा कृपा करेंगे। जो 2 मिनट बैठा है, उसे कम।" बात साफ़ है: समय मायने रखता है, सिर्फ़ संख्या नहीं।

8. मानसिक जप या बोलकर?

जप की तीन श्रेणियाँ हैं:

  1. वाचिक: ज़ोर से बोलकर (कीर्तन में)
  2. उपांशु: होंठ हिलाकर धीमे से
  3. मानसिक: सिर्फ़ मन में, होंठ भी स्थिर

फल की दृष्टि से: मानसिक जप हज़ार गुना, उपांशु सौ गुना, वाचिक एक गुना।

लेकिन नए जापक के लिए? मानसिक जप सीधे करना मुश्किल है। मन भागेगा। इसलिए मैं कहूँगा: शुरुआत उपांशु से। होंठ धीरे-धीरे हिलें, आवाज़ लगभग न हो। जैसे-जैसे अभ्यास पक्का हो, होंठ बंद होते जाएँगे। मानसिक जप अपने आप आएगा।


समय: कब बैठें?

9. ब्रह्ममुहूर्त ज़रूरी है?

आदर्श, हाँ। ब्रह्ममुहूर्त (सूर्योदय से डेढ़ घंटा पहले, लगभग 4:00-5:30 बजे) में मन सबसे शांत होता है, वातावरण सात्त्विक, और साधना का फल कई गुना।

व्यावहारिक सच अलग है। अगर आप रोज़ 4 बजे नहीं उठ सकते, तो अपनी सबसे शांत वाली सुबह चुनिए। मैं सवा पाँच बजे उठता हूँ (जनवरी की ठंड में भी, यही एक नियम है जो कभी टूटा नहीं), 5:30 से 6:00 तक जप करता हूँ। काम नहीं रुकता, और साधना भी हो जाती है।

अब लगता है कि ब्रह्ममुहूर्त सच में कुछ अलग है। उस वक्त की शांति किसी और समय नहीं आती। पर शायद मैं ग़लत भी हूँ। जो रात में मन से जप कर लेता है, उसे भी भगवान देखते हैं।

तीन नियम जो ज़रूरी हैं: रोज़ एक ही समय। एक ही जगह। एक ही आसन। यह तीनों मिलकर साधना की ऊर्जा को स्थिर करते हैं।

ब्रह्ममुहूर्त का दृश्य — एक साधक एकांत कमरे में दीया जलाकर, सूर्योदय से पहले की नीली रोशनी में जप करते हुए
ब्रह्ममुहूर्त — वातावरण इतना शांत कि मन भी शांत हो जाए।

जगह की चुनौतियाँ: पीजी, ऑफिस, यात्रा

10. पीजी/हॉस्टल में रहता हूँ: क्या करूँ?

यह सवाल मुझे बहुत बार मिला है। यहीं एक ग़लतफ़हमी है जो मिटानी ज़रूरी है।

आप सोचते हैं: "एकांत नहीं मिलता, कैसे करूँ?" पर जप को एकांत की ज़रूरत नहीं। जप को सच्चे भाव की ज़रूरत है।

पीजी में रहने वालों के लिए:

  1. बिस्तर पर एक कोना चुन लीजिए, सिर्फ़ उसी कोने में जप, हर रोज़।
  2. छोटा आसन रोल करके रख लीजिए। निकाला, बिछाया, जप किया, समेट लिया।
  3. रूममेट सो रहे हों तो मानसिक जप। कोई नहीं जानेगा।
  4. मेट्रो, बस, पैदल चलते, मन में नाम चलाते रहिए।

महाराज जी कहते हैं: "कार्य के बीच हर पाँच मिनट में एक बार 'राधा' बोल दो।" यह गृहस्थ और हॉस्टल दोनों के लिए है।

11. ऑफिस में काम के बीच जप हो सकता है?

हाँ, और यही असली साधना है।

सुबह का 30 मिनट औपचारिक जप। बाकी 15 घंटे मानसिक जप, काम करते-करते, खाते-खाते, बस में बैठे-बैठे। यह आदत 3 महीने में बनती है। एक बार बन गई तो नाम अपने आप चलता है।

जो सूत्र मैंने अपनाया: हर काम के शुरू में "हरिशरणम", हर काम के बाद "कृष्णार्पणमस्तु"। सेकंड भर का अभ्यास। पूरा दिन भगवान से जुड़ा रहता है।

12. यात्रा में माला साथ ले जाऊँ?

यह तय समझ लीजिए: माला सार्वजनिक जगह पर निकालकर जप करना ठीक नहीं। मेट्रो में, बस में, ट्रेन में माला हाथ में घुमाते लोग अक्सर दिखावे में आ जाते हैं।

माला को माला-बैग में रखिए। चाहें तो बैग के अंदर ही हाथ डालकर जप करिए। या सबसे अच्छा, बिना माला, सिर्फ़ मानसिक जप। यात्रा के घंटे बहुत लाभकारी हैं अगर मानसिक जप सध जाए।


मन की दिक्कतें: जो हर नए जापक को होती हैं

13. मन नहीं लगता — क्या करूँ?

यह सबसे बड़ा सवाल है।

बैठे, माला उठाई, और मन कहीं बाज़ार, कहीं दोस्त, कहीं पुरानी बात। यही है असली संघर्ष।

तीन उपाय हैं।

पहला: स्वीकृति मत दीजिए। महाराज जी एक गहरी बात कहते हैं: "आपकी स्वीकृति के बिना मन कुछ नहीं कर सकता।" मन विचार लाएगा, रोक नहीं सकते। पर "हाँ, इस विचार के साथ चलूँ" यह स्वीकृति आपकी है। विचार आए, आने दीजिए, आप माला आगे बढ़ाते जाइए। विचार अपने आप बह जाएगा।

दूसरा: त्राटक। जप से पहले 2 मिनट इष्ट की छोटी तस्वीर पर या दीपक की लौ पर स्थिर दृष्टि रखिए। आँखें झपकें, झपक जाने दीजिए, फिर खोलिए, फिर देखिए। 2 मिनट में मन एकदम एकाग्र हो जाता है।

तीसरा: व्याकुलता पैदा कीजिए। उन्होंने बार-बार कहा है: "राधा जी के बिना व्याकुल हो जाओ।" कैसे? रोज़ दो मिनट सोचिए, मेरा जीवन कितना छोटा है, कब बुझ जाए पता नहीं, इस बीच में भगवान से जुड़ न पाया तो क्या काम का यह सब? यह वैराग्य का भाव जप में गहराई लाता है।

मन भटकाव का सामना — एक साधक आँखें बंद करके शांत मुद्रा में, विचारों को छोड़ते हुए नाम जप में लौटता
मन भागेगा। आपको बस उसे वापस लाना है। बार-बार।

14. नींद आती है — कैसे रोकूँ?

नींद आना सीधा-सा संकेत है। दो बातें।

शारीरिक कारण: महाराज जी के शब्दों में, "ये सारे लक्षण ब्रह्मचर्य हीनता के हैं।" अगर नींद बहुत आ रही है, पहले ब्रह्मचर्य संभालिए। 11 दिन का प्रण लीजिए।

प्रायोगिक हल: जप से पहले 20 दंड-बैठक, या 10-15 मिनट तेज़ पैदल। शरीर जाग जाए, फिर बैठिए। खाली पेट नहीं, खाकर नहीं, हल्का पानी पीकर।

और एक छोटी बात (जो बहुत काम आती है): मुँह धोकर, नहाकर बैठिए। गंदे कपड़ों में जप करने से आलस अपने आप बढ़ता है।

15. जप करते वक़्त घबराहट क्यों होती है?

यह सवाल मेरे पास आया था। इसका उत्तर दिलचस्प है।

जब आप जप शुरू करते हैं, आपके शरीर में, आपके घर में, आपके आसपास की नकारात्मकता हिलती है। वह नकारात्मकता नहीं चाहती कि आप जप करें। आपका जप उसे कमज़ोर करता है।

इसलिए शुरुआत में:

  • घर में अजीब झगड़े बढ़ जाते हैं
  • अचानक काम में अड़चनें आती हैं
  • पेट ख़राब होता है, कभी सिरदर्द होता है
  • जप के समय अजीब घबराहट होती है

ये सब अच्छे संकेत हैं। नकारात्मकता बाहर निकल रही है। रुकिए मत। घर में छोटा सा हवन करवा लीजिए, कपूर जला दीजिए। जप चलाते रहिए। 10-15 दिन में शांति आ जाएगी।

16. घर में लोग मज़ाक उड़ाते हैं — क्या करूँ?

दिखावा मत कीजिए।

जप प्राइवेट चीज़ है। अपना आसन अपने कमरे के कोने में, माला माला-बैग में। किसी को आपकी साधना का पता चले, इसकी कोई ज़रूरत नहीं।

जब असर दिखने लगेगा, आपके व्यवहार में, शांति में, आकर्षण में, लोग खुद पूछेंगे। तब बताइए। बहस में समय न लगाइए।


तंत्र, टोटके, वशीकरण: नाम जप के सामने

यह सवाल देर-सबेर हर साधक के सामने आता है। बाज़ार में बहुत कुछ बिकता है — मंत्र-यंत्र-ताबीज़, वशीकरण के टोटके, "नज़र" उतारने की राख-धागे, "100% गारंटीड" तांत्रिक उपचार। और जब जीवन में कोई दुख खींचता है, मन कमज़ोर हो जाता है, तो ये दुकानें अपने आप दिखने लगती हैं।

मैं भी एक बार लगभग फँसा था। एक रिश्तेदार ने कहा "किसी ने कुछ कर दिया है", एक नंबर दिया, उस "गुरु जी" ने 11,000 रुपए माँगे, राख और धागा भेजा। चार महीने तक कुछ नहीं हुआ। पैसे गए, मन और थका। तब समझ में आया।

महाराज जी ने इस पूरे मामले पर बहुत साफ़ बात की है:

"छू से जंतु, मंत्र से पानी और राख देने से — ऐसे से नहीं होता। इसका निदान डॉक्टरों के पास जाना चाहिए। और यह सब नौटंकी नाटक में कोई ना फँसे, नहीं हाथ कुछ नहीं लगेगा।"

उन्होंने इसकी वजह भी बताई: "हम बातों को मानते हैं जो शास्त्र प्रमाणित है।"

अब इसे नाम जप से तुलना कीजिए।

मंत्र बाज़ार में नहीं मिलते। महाराज जी का दूसरा सूत्र है: "ऐसे मंत्र कोई बाज़ार है क्या कि ख़रीद ले? भगवान के नाम तो ठीक है — और मंत्र गुरु से लिए जाते हैं।" यानी असली मंत्र गुरु-दीक्षा से आते हैं, और भगवान का नाम पहले से सबके लिए खुला है। नाम के लिए न फ़ीस, न दुकान, न दलाल।

नाम में कोई शर्त नहीं। "जिसमें किसी भी तरह का कोई विधि-निषेध नहीं है। अपवित्र-पवित्र, सर्व-अवस्था…" — महाराज जी का सीधा निर्देश। तंत्र में सख़्त विधि होती है, गलत हो जाए तो उल्टा असर। नाम में ऐसा कुछ नहीं — स्नान न किया हो, पीरियड हों, बीमार हों — नाम चलता रह सकता है।

नाम पहरेदार है। महाराज जी कहते हैं: "नाम पहरेदार बहुत ज़ोर का है — दिन-निशि, अंदर तो आ नहीं सकता।" जब नाम भीतर चलता है, बाहर से कोई नकारात्मक शक्ति प्रवेश नहीं कर सकती। राख-धागे की क्या ज़रूरत?

नाम पाप-वासना सब नष्ट करता है। "नाम जपते ही वासनाएँ नष्ट होने लगती हैं, पाप नष्ट होने लगते हैं, पाप की प्रवृत्ति नष्ट होने लगती है।" तांत्रिक उपचार बाहर से असर डालने की कोशिश करते हैं; नाम भीतर से ख़ुद बदलाव लाता है। एक स्थायी, दूसरा हंगामी।

मेरी सीधी बात: अगर कोई "गुरु जी" आपसे पैसे माँग रहा है किसी "उपचार" के लिए, समझ लीजिए वह नौटंकी है। एक रुद्राक्ष या स्फटिक माला उठाइए, एक आसन बिछाइए, और रोज़ 11 दिन राधे राधे। जो "तांत्रिक" हटाने का दावा करता है, वह नाम अपने आप हटा देगा — बिना फ़ीस, बिना दलाल, बिना डर।


अनुभव और संकेत: असली वाली बातें

17. कैसे पता चलेगा मेरा जप काम कर रहा है?

नए जापक को यह चिंता रहती है। मुझे भी थी।

कुछ संकेत जो अपने अनुभव में देखे, और जिनकी पुष्टि कई बड़े साधकों ने की है:

शारीरिक संकेत:

  1. जप करते-करते शरीर हल्का-हल्का आगे-पीछे हिलने लगता है। यह करंट उतर रहा है।
  2. आँखों में बिना रोए पानी आ जाता है, उबासी आती है। यह सफाई है।
  3. कभी रोमांच होता है, कभी ठंडी लहर रीढ़ पर चलती है।

व्यावहारिक संकेत:

  1. क्रोध कम होने लगता है। छोटी-छोटी बातों पर उत्तेजित नहीं होते।
  2. नींद गहरी होती है, कम में पूरी होती है।
  3. खाने में पहले जैसी लालसा नहीं रहती।

आध्यात्मिक संकेत:

  1. मंदिर जाने पर अलग सी ऊर्जा महसूस होती है, रोंगटे खड़े होना।
  2. कुछ पुराने रिश्ते अपने आप छूटने लगते हैं, नए सात्त्विक लोग मिलते हैं।
  3. सपने बदलते हैं, कभी इष्ट की झलक, कभी मंदिर, कभी संत।

18. सपने में भगवान दिखें — तो क्या करूँ?

पहली बार जब मुझे ऐसा कोई सपना आया, मैं भागकर सबको बताने लगा था। यह सबसे बड़ी गलती होती है।

महाराज जी साफ़ कहते हैं: "भगवान के अनुभव छुपाने से बढ़ते हैं। गाने से रुक जाते हैं।" क्यों? क्योंकि जब आप अनुभव सुनाते हैं, उसके पीछे एक महीन अहंकार आता है: "देखो, मुझे यह हुआ।" यह अहंकार ही साधना को घटाता है।

अब मेरा नियम यह है: कोई अनुभव हो, एक डायरी में लिख लेता हूँ। बंद करके रख देता हूँ। किसी को नहीं बताता, सिर्फ़ महाराज जी के चरणों में अर्पण कर देता हूँ। अनुभव और गहरे होते हैं।

19. जप सिद्ध कब होता है?

संख्या की बात करें तो कहा जाता है एक करोड़ जप पर मंत्र सिद्ध होता है, भाग्य की रेखा तक बदल सकती है। अगर रोज़ 100 माला करें तो साल भर में एक करोड़।

और एक बात जो लोग अक्सर पूछते हैं — कुंडलिनी जागरण, चक्र भेदन, दिव्य दृष्टि, सिद्धियाँ — इनके लिए अलग से क्या करना है? महाराज जी का जवाब बहुत सीधा है: "कुंडलिनी जागृत कर देगा। ये चक्रों का भेदन कर देगा। ये सब कर देगा। नाम जप में लगो।" और इसके पीछे शास्त्र का सूत्र — "कलयुग केवल नाम अधारा।" यानी जो कुछ अष्टांग योग, कठोर तपस्या, या तांत्रिक साधना से मिलने का दावा है, वह सब नाम जप ख़ुद कर देता है — अपने समय पर, अपने ढंग से। दिव्य दृष्टि के बारे में तो उन्होंने एक खुली गारंटी दी है: "नाम जप करो — अगर संसार भगवान का स्वरूप ना नज़र आने लगे तो मुझे कहना।" संसार में हर जगह भगवान दिखने लगना — यही सच्ची दिव्य दृष्टि है। यह नाम जप का स्वाभाविक फल है, अलग से माँगने की चीज़ नहीं।

पर भाव की बात करें तो मंत्र सिद्ध तब होता है जब भगवान से कुछ माँगने का मन ही नहीं रहता। बस उनका मिल जाना काफ़ी लगता है।

यहीं मंत्र सिद्ध और साधक सिद्ध का अंतर है। मंत्र सिद्ध वह जो शक्ति माँगे तो मिल जाए। साधक सिद्ध वह जो शक्ति माँगे ही नहीं, बस प्रेम माँगे।

हमारा लक्ष्य पहला नहीं, दूसरा है।


जीवनशैली: जप के साथ क्या बदलें

20. ब्रह्मचर्य कितना ज़रूरी है?

बहुत ज़रूरी। पर घबराइए नहीं।

गृहस्थ हैं, विवाहित हैं तो पूरे ब्रह्मचर्य की माँग नहीं है। पर 11 दिन का प्रण ले सकते हैं। इस दौरान साधना तीव्र होगी।

अविवाहित हैं, छात्र हैं तो बेसिक ब्रह्मचर्य ज़रूरी है। आँखों का, विचारों का, पोर्न और फ़िल्मी वासना से दूरी। यह साधना की नींव है।

21. खाने में क्या बदलूँ?

बहुत कुछ नहीं। शुरुआत में बस:

  • तामसिक भोजन कम: मांस, शराब, प्याज-लहसुन (तुलसी माला पर जप करते हैं तो बंद)।
  • रात का खाना हल्का, सूर्यास्त से पहले हो सके तो बेहतर।
  • जप से पहले कुछ न खाएँ, खाली पेट या हल्का फलाहार।
  • गुस्से में, दुःख में भोजन न बनाएँ। खाना ऊर्जा लेता है बनाने वाले से।

धीरे-धीरे शरीर खुद बताएगा क्या चाहिए। जब शरीर शुद्ध होगा, तामसिक चीज़ों की तलब अपने आप कम होगी।

22. गुरु के बिना जप हो सकता है?

यह शायद सबका संवेदनशील सवाल है। महाराज जी की साफ़ बात यहाँ दो हिस्सों में है —

नाम जप — हाँ, बिना गुरु हो सकता है। राधे राधे, हरे कृष्ण, श्री राम, साम सदाशिव (मन में) — ये नाम सबके लिए खुले हैं। किसी भी अवस्था में, कहीं भी जप सकते हैं।

मंत्र जप — नहीं। महाराज जी ने स्पष्ट कहा है:

"पंचाक्षरी मंत्र है, किसी गुरु से मंत्र लो और फिर उच्चारण मत करो। सिद्धांत से चलो, मनमानी मत करो।"

यानी ॐ नमः शिवाय, गायत्री, नवार्ण, महामृत्युंजय — ये सब बिना गुरु-दीक्षा नहीं।

तो क्या करें जब तक गुरु न मिले? महाराज जी का ही मार्ग:

"साम सदा शिव जपो, और किसी शिव उपासक को गुरु रूप में वरण करो। फिर उनसे पंचाक्षरी मंत्र लो।"

व्यावहारिक अनुवाद: नाम जप चलाते रहिए रोज़। साथ-साथ किसी संत के सत्संग सुनते रहिए — महाराज जी के सत्संग इतने उपलब्ध हैं कि सुनते-सुनते मन उन पर जाए तो यह मानसिक जुड़ाव भी एक सहारा है। और भगवान से प्रार्थना करिए कि सच्चा गुरु मिले। महाराज जी कहते हैं — "वही गुरु है, किसी किसी रूप में मिलकर वही दे देंगे।"

मेरी व्यक्तिगत बात — मेरे एक मित्र ने सीधे ॐ नमः शिवाय शुरू कर दिया था, बिना किसी दीक्षा के, और उसे कोई दिक्कत नहीं हुई। भगवान की कृपा है। पर यह अपवाद है, नियम नहीं। महाराज जी का निर्देश सिद्धांत है, अनुभव अपवाद। नए जापक को सिद्धांत से चलने की सलाह दूँगा।

23. इष्ट देव कैसे चुनूँ?

एक सरल तरीका जो मैंने पाया।

आँख बंद कीजिए। सोचिए: "अगर आज मेरे शरीर का अंतिम क्षण हो, तो मैं किस भगवान के पास जाना चाहूँगा? किसके नाम पर सबसे पहले मन जाएगा?"

वही आपके इष्ट हैं।

अगर उत्तर साफ़ नहीं आता, कोई तनाव नहीं। राधे राधे या हरे कृष्ण से शुरू कर दीजिए — ये सबसे खुले नाम हैं। धीरे-धीरे इष्ट अपने आप प्रकट होते हैं। अक्सर एक इष्ट से दूसरे पर मन जाता है, यह सामान्य है। फ़ाइनल इष्ट वह है जो सालों बाद भी बदले नहीं।

इष्ट देव चयन — विभिन्न देवी-देवताओं के रूप में हाथ जोड़े साधक की साकार भाव मुद्रा
जो सहज लगे, वही आपके इष्ट हैं।

ख़ास दिनों की बात

24. नवरात्रि, शिवरात्रि, एकादशी पर विशेष जप?

हाँ। इन दिनों का फल कई गुना होता है।

  • नवरात्रि: देवी के नाम का जप 10,000 गुना फल
  • शिवरात्रि: शिव के नाम का जप (साम सदाशिव, हर हर महादेव) 1,000 गुना
  • एकादशी: विष्णु / कृष्ण नाम का जप 1,000 गुना
  • सूर्य/चंद्र ग्रहण: नाम जप 1,000 गुना

इन दिनों अतिरिक्त संकल्प लीजिए। रोज़ की 1 माला को 11 या 21 कर दीजिए। ख़ास कुछ माँगिए नहीं, बस भगवान के दर्शन या कृपा।

(मंत्र जप — पंचाक्षरी, गायत्री आदि — गुरु-दीक्षा के बाद ही। यहाँ मैंने नाम जप ही बताए हैं।)

25. संकल्प क्या होता है, कैसे लूँ?

इस पर कम बात होती है, पर यह बहुत ज़रूरी है।

संकल्प यानी जप शुरू करने से पहले भगवान को बताना कि आप क्या करने जा रहे हैं, क्यों कर रहे हैं।

विधि: हाथ में थोड़ा जल लीजिए। आसन पर बैठकर कहिए:

"मेरा नाम [आपका नाम], पिता का नाम [पिता का नाम] है। आज [तिथि] है। मैं आज से [इतने] दिन तक, रोज़ [इतनी] माला [इस] मंत्र की जप करने का संकल्प लेता/लेती हूँ। उद्देश्य — भगवान [इष्ट का नाम] के चरणों में प्रेम की प्राप्ति।"

जल थोड़ा माथे पर, बाक़ी मंदिर या तुलसी में।

बिना संकल्प ऊर्जा बिखरी रहती है। संकल्प से उसे दिशा मिलती है। नकारात्मकता उसे चुरा नहीं पाती। और 11 दिन का संकल्प अगर पूरा हो गया, तो आपकी पहली जीत हुई।


आख़िर में: अपनी बात

दो साल पहले मैं भी यही सोचता था कि जप करना कोई कठिन काम है, बड़ा अनुशासन चाहिए, बहुत कुछ छोड़ना पड़ेगा।

बिल्कुल ग़लत।

आज लगता है कि जप करना सबसे सरल काम है। न करना सबसे कठिन।

जो पहले-पहल मैंने सोचा था, यह धर्म है, इसमें ऊँचा-नीचा, शुद्ध-अशुद्ध, सब नियम हैं, वह सब टूट गया। जप कोई धार्मिक कर्मकांड नहीं। यह मन की दवाई है।

आप सुबह दाँत माँजते हैं। क्यों? क्योंकि रात भर गंदगी जम गई। मन में भी दिन भर, जीवन भर, जन्मों से गंदगी जमी है। जप उसकी सफाई है। रोज़ की। इसे छोड़िए मत।

अगर आप आज ही शुरू करना चाहते हैं:

  1. एक लाल या पीला कपड़ा आसन के लिए
  2. एक साधारण रुद्राक्ष की 108 मनके की माला
  3. एक छोटा संकल्प: "आज से 11 दिन, रोज़ 1 माला राधे राधे" (या अपने इष्ट का नाम)
  4. सुबह का एक समय तय, जो भी हो, एक ही हो
  5. माला के दौरान कोई बात नहीं, कोई फ़ोन नहीं, मौन

बस इतना।

11 दिन बाद, जब आप दोबारा यह लेख पढ़ेंगे, पाएँगे कि ये 25 सवाल आपके नहीं रहे। आपके अपने नए 25 सवाल होंगे। और यही है साधना की सीढ़ी।

एक नई सीढ़ी चढ़ने की शुभकामनाएँ।

राधे राधे।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

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Satish Sahu — jaapak.com लेखक
सतीश साहू

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इस लेख के बारे में

व्याख्या सनातन परंपरा की सामान्य समझ पर आधारित है और सरल हिंदी में लिखी गई है। किसी आधुनिक टीकाकार का शब्दशः उद्धरण नहीं है।

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