शराब की लत कैसे छोड़ें: प्रेमानंद महाराज का अद्भुत उपाय
Sharab ki lat kaise chode? Premanand Maharaj ji bataate hain ki vyasan ki jad aatmik hai — ichchhashakti nahi, Shri Ji ki kripa aur satsang-shravan hi is cycle ko tod sakta hai. Jaani Rana ji ka sachcha anubhav.

घर में शराब की बोतल छुपी हो, और मन कहे — "आज बस आखिरी बार।" कल फिर वही हाल। यह cycle जिसने जिया है, वही जानता है। sharab ki lat kaise chode, यह प्रश्न कितना गहरा दर्द लेकर आता है।
शराब की लत से कैसे छुटकारा पाएं?
अक्सर हम सोचते हैं कि नशा सिर्फ एक बुरी आदत है, जरा-सी इच्छाशक्ति लाओ, छूट जाएगी।
लेकिन महाराज जी इसे बहुत गहरी नजर से देखते हैं। वो कहते हैं यह राक्षसी बुद्धि का प्रकटन है। जब तक वह बुद्धि नहीं बदलती, बाहरी उपाय काम नहीं करेंगे।
और राक्षसी बुद्धि बदलती है अध्यात्म से।
इसीलिए महाराज जी का उत्तर इच्छाशक्ति नहीं है, rehabilitation center भी नहीं। श्री जी की कृपा है। जो भीतर से जड़ काटती है और संस्कार बदल देती है। जो वह करती है जो दशकों की कोशिश नहीं कर पाई।
मेरठ के जनी राणा जी ने खुद अपने जीवन में यही अनुभव किया। उन्होंने लिखा:
"दारू के बिना मैं रह नहीं सकता था।"
यह सैद्धांतिक बात नहीं, महाराज जी के सत्संग में इसके जीवित प्रमाण आते हैं।
क्या सत्संग से सच में व्यसन छूट जाता है?
जनी राणा जी, मेरठ से। यह नाम उन सभी के लिए एक उम्मीद है जो सोचते हैं कि उनसे नशा नहीं छूटेगा।
उन्होंने महाराज जी को लिखा कि पहले जीवन बिगड़ा हुआ था। शराब इतनी थी कि पूरा परिवार दुखी था। खुद भी जानते थे कि गलत हो रहा है, फिर भी रुक नहीं पाते थे। परिवार ने समझाया। इच्छाशक्ति लगाई। कुछ नहीं हुआ।
फिर सत्संग-श्रवण शुरू हुआ, और वह हुआ जो दशकों में नहीं हुआ था।
महाराज जी के शब्द, बिना किसी जादू के, बिना किसी दवा के, भीतर उतरते गए। संस्कार बदलते गए। (मैं भी पहले यही सोचता था कि ऐसा परिवर्तन सिर्फ किताबों में होता है।) एक दिन जनी राणा जी ने लिखा:
"कभी सोचा नहीं था कि ऐसा भी जीवन आएगा!"
और बाहरी परिवर्तन देखिए, लहसुन-प्याज तक छोड़ दिया। यह आंतरिक क्रांति का बाहरी प्रमाण है। जब भीतर का भाव बदलता है, तो बाहरी आचरण खुद-ब-खुद बदल जाता है।
महाराज जी ने उन्हें सुनकर कहा: "भगवान की विशेष कृपा आप में है जो आपने जीवन को संभाल लिया।"
श्रवण-मात्र से संस्कार कैसे बदलते हैं? महाराज जी इसका उत्तर देते हैं: जब उपदेश देने वाले का उद्देश्य केवल जगत का मंगल हो, जब उनके जीवन का तप और भजन उस शब्द में समाया हो, तो वही शब्द जाता है और परिवर्तन कर देता है। परंतु परिवर्तन के बाद की परीक्षा और भी कठिन होती है, एक बार छूटने के बाद दलदल में दोबारा न गिरना।
नशा छोड़ने के बाद relapse से कैसे बचें?
नशा छूट गया। यही काफी नहीं है।
महाराज जी की एक स्पष्ट चेतावनी है: जैसे हाथ टूट जाए और जुड़ जाए, तो ठीक तो होता है, लेकिन वहाँ कमजोरी बनी रहती है। एक दबाव में टूट सकता है। बुरे मित्रों की एक भेंट वर्षों की साधना को पल में धो सकती है।
कोई पुराना दोस्त मिलेगा और कहेगा: "अरे यार, इतना बड़ा भगत बन गया?" और पाँचवें दिन वृंदावन छूट जाएगा।
तुलसीदास जी ने कहा था: "उमा, ते लोग अभागी जो हरि तज होए विषय अनुरागी।" जो भगवान का नाम छोड़कर विषयों की तरफ लौटता है, वह अभागा है। कठोर शब्द है, पर सच्चा है।
लेकिन इस खतरे से बचने का उपाय भी महाराज जी ने दिया है:
"शब्दों से ही शक्ति मिल जाएगी। शब्दों से ही आशीर्वाद मिल जाएगा।"
नाम-जप और सत्संग-श्रवण, यह दैनिक अनिवार्यता है (और ये बात कोई नहीं बताता, लेकिन महाराज जी बार-बार इसी पर जोर देते हैं)। जैसे रोज खाना खाते हैं, वैसे रोज सत्संग सुनना है। यही कवच है, यही वह दुर्ग है जिसके भीतर relapse की ताकत नहीं पहुँचती।
व्यसन का एक और छुपा आयाम है जिसे महाराज जी विशेष रूप से उठाते हैं, माता-पिता को होने वाला कष्ट।
माता-पिता को कष्ट देने का क्या परिणाम होता है?
शराबी संतान के कारण घर में जो दुख होता है, वह शब्दों में नहीं आता। माँ रातों को रोती है। पिता आँखें चुराते हैं। और यह दुख सीधे उस संतान के भाग्य पर पड़ता है।
महाराज जी कहते हैं कि राक्षसी बुद्धि तब और भी गहरी हो जाती है, जब माँ कुछ कह दे, और नशे में हाथ उठ जाए। यह कोई छोटी बात नहीं।
उपाय? माता-पिता की सेवा।
"जिसने अपने माता-पिता को पूज लिया उसको सुख पहुंचा दिया। वो जिंदगी में कभी दुखी नहीं रहेगा।"
व्यसन-मुक्ति और माता-पिता की सेवा दो अलग बातें नहीं हैं। जब भीतर की राक्षसी बुद्धि जाती है, तो माँ-बाप की सेवा खुद स्वाभाविक हो जाती है। और जब उनकी सेवा होती है, तो भगवान की कृपा का रास्ता खुलता है।
बुरी संगति से बचने के क्या उपाय हैं?
पुराने मित्रों से दूरी, यह सुनकर कठिन लगता है। वर्षों की दोस्ती है। लेकिन महाराज जी साफ कहते हैं: जो मित्र गलत मार्ग पर लगाए, वो शत्रु है। मित्र का बाना पहनकर शत्रु आता है।
यह दूरी विनम्रता से बनाई जा सकती है, पर दृढ़ता जरूरी है।
और जब पुराने मित्र छूटें, तो नया वातावरण चाहिए। सत्संग-समाज में जुड़ना practical solution है। नया माहौल नई आदतें बनाता है, पुरानी छुड़ाता है।
मुझे लगता है कि जनी राणा जी का परिवर्तन इसीलिए टिका, क्योंकि उन्होंने केवल नशा नहीं छोड़ा, उन्होंने एक नया जीवन अपनाया। उन्होंने खुद लिखा:
"आज दारू को देखकर मुझे नफरत होने लगी है। लहसुन-प्यास तक छोड़ दिया।"
यह "नफरत", यही transformation का असली प्रमाण है। जो चीज कभी जीवन की जरूरत थी, वही अब घृणा का विषय बन गई। यह अवस्था सत्संग के निरंतर श्रवण से आती है। महाराज जी का सरल निर्देश है: एक सत्संग छोड़ना भी मत।
निष्कर्ष: कृपा, सत्संग और सावधानी
भैया, चार चीजें एक साथ चाहिए।
पहली: श्री जी की कृपा, जो सत्संग-श्रवण से उतरती है। दूसरी: बुरी संगति का पूर्ण त्याग, जो relapse से बचाती है। तीसरी: माता-पिता की सेवा, जो भाग्य का द्वार खोलती है। चौथी: रोज का नाम-जप, जो इन तीनों को टिकाए रखता है।
जनी राणा जी जैसे उदाहरण हमारे सामने हैं। जो असंभव लग रहा था, वह संभव हुआ। परिवर्तन हुआ। और टिका भी। हजारों ऐसे लोग हैं जिन्होंने शराब छोड़ी, मांस छोड़ा, जीवन बदला, केवल सत्संग-श्रवण से।
महाराज जी कहते हैं:
"राक्षसी बुद्धि का निदान अध्यात्म से होता है।"
और यह अध्यात्म कहीं दूर जाकर नहीं मिलता। आज से महाराज जी का एक सत्संग सुनिए। बस शुरुआत करिए। श्री जी की करुणा पर भरोसा रखिए: "झोली भरी देखी।"
राधे-राधे।
स्रोत: पहले बहुत शराब का नशा करता था पर आपको सुनकर सब छोड़ दिया अब डर लगता है फिर से दोबारा शुरू न कर दूं !
यह लेख श्री प्रेमानंद जी महाराज के सत्संगों से संकलित है। मूल वीडियो ऊपर के लिंक में उपलब्ध है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

स्वतंत्र लेखक, jaapak.com
Jaapak ऐप बनाया है मैंने। भगवद्गीता और सत्संग परंपरा पर सहज हिंदी में लिखता हूँ — ताकि साधक को ग्रंथ समझने में कठिनाई न हो।
सभी लेख पढ़ेंइस लेख के बारे में
व्याख्या सनातन परंपरा की सामान्य समझ पर आधारित है और सरल हिंदी में लिखी गई है। किसी आधुनिक टीकाकार का शब्दशः उद्धरण नहीं है।