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कलयुग में नाम जप का अद्भुत फल — 10,000 वर्ष तप के बराबर

कलयुग में केवल 24 घंटे के नाम जप से 10,000 वर्ष की तपस्या का फल मिलता है। प्रेमानंद जी महाराज से जानें विधि और मन की बाधा का समाधान।

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श्री प्रेमानंद जी महाराज — कलयुग में नाम जप का अद्भुत फल | 24 घंटे का संकल्प, 10,000 वर्ष तप के बराबर

क्या आप जानते हैं कि सतयुग में 10,000 वर्ष की कठोर तपस्या से जो फल मिलता था, वही फल कलयुग में सिर्फ 24 घंटे के नाम जप से मिल सकता है? श्री प्रेमानंद जी महाराज के इस सत्संग में यही बात सामने आती है। सुनकर मन में एक नई आशा जागती है।

कलयुग का अद्भुत वरदान

शास्त्रों में चार युगों का वर्णन है: सतयुग, त्रेता, द्वापर, कलयुग। सतयुग में ऋषि-मुनि हज़ारों वर्षों तक कठोर तप करते थे। उनकी मनःशक्ति इतनी प्रबल थी कि जप, तप, ब्रह्मचर्य का पालन बिना किसी विघ्न के हो जाता था। कानपुर से आए भक्त अखिलेश जी ने महाराज जी से एक सहज-सा प्रश्न पूछा था। महाराज जी का उत्तर था:

"सतयुग में 10,000 वर्ष ब्रह्मचर्य से रहकर दाहिने पैर के बल अंगूठे पर खड़े होकर दोनों हाथ उठाकर मंत्र जप करने से जो फल मिलता था, वही कलयुग में केवल 24 घंटे नाम कीर्तन से उसी फल की प्राप्ति होती है।"

इसे कलयुग का महाप्रताप कहा जाता है। सतयुग की तपस्या कैसी थी? एक पैर के अंगूठे पर दस हज़ार वर्ष खड़े रहना। आज के मनुष्य की कल्पना में भी ऐसी साधना नहीं समाती। पर कलयुग में भगवान ने वही फल 24 घंटे में सुलभ कर दिया। यही इस युग की विशेष कृपा है।

24 घंटे नाम जप की विधि

महाराज जी ने इस अनुष्ठान की विधि बिल्कुल स्पष्ट बताई है। कोई जटिल कर्मकांड नहीं। बस दृढ़ संकल्प चाहिए।

"अगर एक दिन के लिए आप ऐसा नियम ले ले कि प्रातः कालीन चार से लेकर प्रातः कालीन चार अगले दिन तक बिना कुछ खाए हुए वो 10,000 वर्ष तपस्या कर तुम 24 घंटे कर लो नाम जप या नाम कीर्तन तो जो 10,000 वर्ष का वो फल मिलेगा।"

विधि संक्षेप में समझिए:

  • प्रातः 4 बजे अनुष्ठान का आरंभ
  • 24 घंटे तक निरंतर नाम जप, अगले दिन प्रातः 4 बजे तक
  • भोजन और जल नहीं। केवल लघुशंका के समय आचमन करें, पवित्र होकर पुनः बैठ जाएँ
  • एकाग्र चित्त से मंत्र जप या नाम कीर्तन, बिना रुके

महाराज जी आश्वस्त करते हैं:

"जल नहीं पिएगा तो कोई मरेगा नहीं। 24 घंटे आज प्रातः कालीन 4:00 बजे से कल प्रातः कालीन 4:00 बजे तक मंत्र अनुष्ठान... जप करके देखो।"

एक दिन का अनुष्ठान। इतना ही काफी है। ऐसा प्रयोग जो साधक को भीतर से बदल देता है।

सबसे बड़ी बाधा — मन की चंचलता

पर यह अनुष्ठान सरल नहीं है। महाराज जी ने स्वयं यह स्पष्ट किया। इसका एकमात्र कारण है हमारा मन।

"कलयुग में मन नहीं लगता है। सबसे बड़ी समस्या यह है कि सतयुग आदि में मन बड़ा... इतना मन को साधे हुए लोग थे कि कहीं भी मन से भी कोई पाप ना हो जाए।"

सतयुग के साधकों का मन इतना परिष्कृत था कि मानसिक पाप भी उनसे नहीं होते थे। आज की स्थिति क्या है? महाराज जी कहते हैं:

"अपना तो अगर मन छोड़ दो तो पाप ही करता रहता है।"

इसीलिए 24 घंटे एक नाम में मन को टिकाए रखना इतना दुष्कर है। मन की यह प्रकृति महाराज जी बड़े स्नेह से समझाते हैं:

"आतंक मचा देगा। मन बड़ा बदमाश है, बड़ा बदमाश है। एक क्षण में नजारे कहां से कहां ले जाता है।"

माँ रेणुका की कथा — मानसिक पाप का गहन प्रसंग

कलयुग की विशेष कृपा को समझाने के लिए महाराज जी ने भगवान परशुराम की माता रेणुका जी का प्रसंग सुनाया।

माता रेणुका संध्यावंदन हेतु गंगाजी से जल लेने गई थीं। वहाँ उन्होंने देखा कि एक गंधर्व अप्सरा के साथ विलास कर रहा था। उस दृश्य को देखते-देखते संध्या का समय निकल गया। जब वे लौटीं, महर्षि जमदग्नि ने विलंब का कारण पूछा। माता रेणुका ने सच कह दिया। महर्षि ने तत्काल निर्णय सुनाया: पतिव्रता होकर परपुरुष के विलास में मन रमाना अपराध है, दंड मिलेगा। उन्होंने पुत्रों को माँ का वध करने की आज्ञा दी। किसी का साहस नहीं हुआ। तब भगवान परशुराम आए। पिता की आज्ञा मिली, और बिना एक प्रश्न किए, उन्होंने माँ और भाइयों का वध कर दिया। पिता प्रसन्न हुए। परशुराम जी ने वरदान माँगा कि माँ और भाई पुनः जीवित हो जाएँ, और उन्हें यह सारी स्मृति भी न रहे।

महाराज जी इस प्रसंग का सार इन शब्दों में देते हैं:

"सोचो तो — केवल गंधर्व और अप्सरा की केली को देखने का दंड दिया कि गला कटवा दिया।"

अन्य युगों में मानसिक पाप का भी उतना ही कठोर दंड था जितना कर्म द्वारा किए गए पाप का।

कलयुग की अपार कृपा

कलयुग में यह नियम शिथिल हुआ है। महाराज जी तुलसीदास जी का वचन उद्धृत करते हैं:

"कलि कर एक पुनीत प्रताप। मानस पुण्य होए नहीं पापा।"

मतलब यह कि कलयुग में मन में पाप की भावना आने भर से पाप नहीं लगता। पाप कर्म से लगता है, केवल विचार से नहीं। दूसरी ओर, मन में भगवान का स्मरण आ जाए तो पुण्य अवश्य मिलता है। कलयुग की कृपा दोनों ओर से है। पाप का बोझ हल्का है, नाम जप का फल बड़ा।

महाराज जी का सरल और व्यावहारिक संदेश

महाराज जी असंभव साधना का उपदेश कभी नहीं देते। वे जानते हैं, गृहस्थ जीवन में हर दिन ऐसा अनुष्ठान संभव नहीं। इसलिए वे कहते हैं:

"24 घंटे ना सही 10 घंटे तो लगेगा। आप लगा के देखो।"

प्रयास ही साधना की नींव है। उनका अंतिम संदेश बहुत सीधा है:

"नाम जप करो। अपने कर्तव्य का पालन करो। आप उचित धर्म पूर्वक विषयों का सेवन करो।"

निष्कर्ष

कलयुग में जन्म लेना वरदान है। सुनने में विचित्र लगता है, पर महाराज जी के इस सत्संग से यही बात सामने आती है। एक ओर मन की चंचलता सबसे बड़ी बाधा है। दूसरी ओर, केवल 24 घंटे के नाम जप का फल 10,000 वर्ष की तपस्या के समान है।

हम सब साधारण गृहस्थ हैं। न वर्षों की तपस्या संभव है, न वनवास। पर एक दिन? बस एक दिन का संकल्प? वह तो हम कर ही सकते हैं। महाराज जी का आशीर्वाद साथ है।

इस कलयुग के महाप्रताप का लाभ ज़रूर उठाइए।

राधे-राधे।


स्रोत: 10,000 वर्षों की तपस्या का फल 24 घंटे में प्राप्त करने की विधि क्या है? Bhajan Marg

यह लेख श्री प्रेमानंद जी महाराज के सत्संगों से संकलित है। मूल वीडियो ऊपर के लिंक में उपलब्ध है। इस लेख के सभी चित्र डिजिटल रूप से तैयार किए गए हैं।

लेखक
Satish Sahu — jaapak.com लेखक
सतीश साहू

स्वतंत्र लेखक, jaapak.com

Jaapak ऐप बनाया है मैंने। भगवद्गीता और सत्संग परंपरा पर सहज हिंदी में लिखता हूँ — ताकि साधक को ग्रंथ समझने में कठिनाई न हो।

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इस लेख के बारे में

व्याख्या सनातन परंपरा की सामान्य समझ पर आधारित है और सरल हिंदी में लिखी गई है। किसी आधुनिक टीकाकार का शब्दशः उद्धरण नहीं है।

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