अपनापन — 5 सूत्र जो भगवान को आपका बना दें | प्रेमानंद महाराज
अपनापन क्या है? श्री प्रेमानंद जी महाराज के 5 सूत्र — भगवत प्राप्ति का सरलतम मार्ग, भाव से जुड़ने की सच्ची विधि।

भगवान आपके हैं — बस एक बात याद रखनी है
श्री प्रेमानंद जी महाराज कहते हैं — "आप बिल्कुल घबराना मत। भगवत प्राप्ति का हम आपको सरल सूत्र बता रहे हैं।"
वो सूत्र क्या है? एक शब्द में — अपनापन।
बहुत लोग पूछते हैं — रोज़ जप करते हैं, शास्त्र पढ़ते हैं, मंदिर जाते हैं, फिर भी मन शान्त क्यों नहीं? जवाब जानना हो तो यह लेख पढ़िए। महाराज जी की सीख है कि साधना तभी फलती है जब भाव में अपनापन जुड़े। क्यों, कैसे, और कौन से 5 सूत्र इसे रोज़ के जीवन में उतार सकते हैं — सब नीचे समझाया है।
अपनापन क्या है — प्रेमानंद महाराज के अनुसार?
अपनापन का अर्थ है — भगवान को पूरी तरह अपना मानना, और स्वयं को पूरी तरह उनका। श्री प्रेमानंद जी महाराज समझाते हैं कि यह कोई शब्दों का खेल नहीं, भाव का विषय है। भगवान कहते हैं — "भाव का भूखा हूँ मैं।" यानी वो हमारी विद्या नहीं, भाव देखते हैं।
ध्यान दीजिए — "अपना" मानना और "अपना" होना एक ही बात नहीं। अपना मानना बुद्धि का काम है। अपना होना हृदय का। महाराज जी इसी हृदय-स्थिति की बात कर रहे हैं।
"अपनापन आप अपनापन समेट श्री जी के चरणों में दीजिए।"
— श्री प्रेमानंद जी महाराज
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जहाँ श्री राधा रानी से अपनापन जम जाए, वहाँ सब अपराध — भूत के, वर्तमान के, और भविष्य के भी — क्षमा हो जाते हैं। श्री हित हरिवंश महाप्रभु जी का वचन याद आता है — "अवगुन करे समुद्र सम, गनत ना अपनो जान अपनो।"
प्रश्न: अपनापन और आत्म-समर्पण में फर्क क्या है?
उत्तर: आत्म-समर्पण एक क्रिया है — "मैं आपको सौंपता हूँ।" अपनापन एक स्थिति है — "आप ही मेरे हैं, मैं आपका हूँ।" समर्पण में दो लोग हैं; अपनापन में एक ही। यही महाराज जी का सूक्ष्म भेद है।

अपनापन से भगवत प्राप्ति क्यों होती है?
भगवत प्राप्ति अपनापन से इसलिए होती है क्योंकि भगवान स्वयं कहते हैं — "अहं भक्त-पराधीन अस्म्यहं" — मैं भक्त के अधीन हूँ। जो परम स्वतंत्र ब्रह्म हैं, वो अपने मुख से कह रहे हैं कि वे भक्त के वश में हैं। महाराज जी पूछते हैं — इससे बड़ा सम्मान, इससे बड़ा प्यार, क्या कुछ और हो सकता है?
यह बात उनके लिए कही गयी है जो प्रभु के सिवा किसी को अपना नहीं मानते। बात छोटी है, पर अमल कठिन। हमारा भरोसा कई जगह बँटा है — कुछ व्यक्ति पर, कुछ वस्तु पर, कुछ परिस्थिति पर। जब तक यह बँटवारा है, तब तक भगवान अपने पूर्ण स्वरूप में प्रकट नहीं होते।
महाराज जी स्पष्ट कहते हैं — "जिस दिन और किसी का भरोसा नहीं रहेगा, उसी दिन प्रभु का साक्षात्कार हो जाएगा। तब तक विलम्ब है प्रभु की तरफ से।" विलम्ब हमारी तरफ से है, प्रभु की तरफ से नहीं। यह समझ लेना बड़ी बात है।
अपनापन कैसे करें — 5 व्यावहारिक सूत्र
अपनापन विकसित करने के 5 सूत्र इस प्रकार हैं — ये सूत्र श्री प्रेमानंद जी महाराज के सत्संग से संकलित हैं, और हर गृहस्थ-साधक रोज़ के जीवन में अपना सकता है।
- रोज़ समर्पण का अभ्यास। सत्संग का कार्य है कि आपको हर दिन थोड़ा-थोड़ा खींचकर प्रभु के निकट करे। इसे रोज़ का अनुष्ठान बना लीजिए — जिस तरह भोजन और स्नान नित्य हैं, वैसे ही आत्म-समर्पण का एक क्षण भी नित्य हो।
- किशोरी जी के चरणों में भरोसा। महाराज जी कहते हैं — "किशोरी जी ने इशारा कर दिया कि मेरा नाम रटता है, मेरे आश्रित है — देख लो प्रीतम।" श्री राधा रानी का नाम लेना और उनके चरणों में भरोसा रखना — यही एक निर्णय बाकी सब निर्णयों से ऊपर है।
- बँटा हुआ भरोसा समेटना। "हमारा भरोसा कई जगह फँसा हुआ है" — महाराज जी का यह निदान सटीक है। धीरे-धीरे, सत्संग और भजन से, अपने भरोसे के टुकड़े एक-एक करके श्री चरणों में समेटिए। यह जबरदस्ती नहीं होगा, समय के साथ स्वाभाविक रूप से होगा।
- हरिनाम का नित्य जप। राम-नाम में सामर्थ्य है कि भगवान को अधीन कर लेता है। महाराज जी का वचन है — "जिसकी जिव्हा के अग्र भाग पर हरिनाम विराजमान, स्वपच भी चांडाल भी परम श्रेष्ठ और वंदनीय हो जाता है।" जप की कोई विशेष संख्या नहीं — नियमितता ही सब कुछ है।
- भगवान से कपट न करना। सबसे छूटने वाला सूत्र। हम आरती में गाते हैं — "तन-मन-धन सब तेरा, क्या लागे मेरा।" फिर रोज़ के जीवन में भगवान से शर्त लगाते हैं — "ऐसा कर दीजिए तो मेरा।" यह कपट है। महाराज जी की सीख है कि दिया हुआ मान लीजिए, सिर्फ़ अपनापन जोड़िए।
प्रश्न: इन 5 में सबसे पहले कौन सा शुरू करें?
उत्तर: सूत्र 4 — हरिनाम जप। बाकी चारों सूत्र नाम-जप के साथ अपने-आप फलते हैं। महाराज जी का कहना है कि नाम-जप ही वह आधार है जिस पर अपनापन खड़ा होता है।

मीरा बाई का अपनापन — एक अद्भुत उदाहरण
मीरा बाई का प्रेम भगवान के प्रति कभी बँटा नहीं। उनका प्रसिद्ध पद है — "मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई।" इस एक पंक्ति में अपनापन का पूरा दर्शन छुपा है।
श्री प्रेमानंद जी महाराज कहते हैं कि भगवान हमसे उतना ही प्रेम करते हैं जितना मीरा जी से — कमी हमारी तरफ से है, प्रभु की तरफ से नहीं। हम "मेरे तो गिरधर गोपाल" तक पहुँच जाते हैं, पर "दूसरो न कोई" वाली पंक्ति अधूरी रह जाती है। जीवन में बहुत कुछ और भी है जिसे हम बराबर महत्व देते रहते हैं।
यहीं मीरा जी और हम में अंतर है। उनका भरोसा बँटा नहीं था, इसलिए उन्हें गिरधर ने स्वयं अंगीकार कर लिया। हमारा भरोसा बँटा है, और यहीं विलम्ब है।
अपनापन का फल — भगवत प्राप्ति का स्वरूप
अपनापन का फल यह है कि बिना किसी प्रयास के भगवान मन में बसे रहते हैं — यही भगवत प्राप्ति का असली स्वरूप है। श्री प्रेमानंद जी महाराज कहते हैं — "जब बिना किसी प्रयास के भगवान दिमाग में छाए, मन में छाए, दूसरी कोई स्फुरणा नहीं, तो कोई और भगवत प्राप्ति नहीं होनी — हो गया।"
लोग समझते हैं कि भगवत प्राप्ति में कोई चमत्कारी दृश्य दिखता है, तेज़ फूटता है, कैमरे के फ़ोकस जैसा कुछ होता है। नहीं। महाराज जी सीधा कहते हैं — यह छाती का विषय है, हृदय का विषय है। "प्रीतम बस गयो मेरे मन, मन में तन में नेत्रों में समा गया।" यही स्थिति अपनापन का परिणाम है।
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समापन
भगवत प्राप्ति दूर नहीं है। दूर है तो बस अपनापन। श्री प्रेमानंद जी महाराज बार-बार यही एक बात दोहराते हैं — कमर कस लीजिए, बाक़ी का काम श्री जी का है।
स्रोत: #08 सार की बात — 30-09-2023 — Bhajan Marg
यह लेख श्री प्रेमानंद जी महाराज के सत्संगों से संकलित है। मूल वीडियो ऊपर लिंक में उपलब्ध है। किसी भी उद्धरण की पुष्टि के लिए मूल सत्संग देखें।
राधे राधे 🙏
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